नई दिल्ली: सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में जेडीयू और एलजेपी के रिश्तों में लगातार बढ़ती कड़वाहट और विपक्षी खेमे में सामने आ रहे मतभेदों ने बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में किसी तरह के नए राजनीतिक समीकरण की संभावनाओं को खारिज कर दिया है.

सूत्रों ने कहा कि यह अभी तक तय नहीं है कि राज्य की खंडित राजनीति में किसी तरह के नए गठबंधन बनेंगे, लेकिन दोनों खेमों के संबंध में ऐसी कोई संभावना नहीं दिखती जिससे कुछ दलों को अपने लिए विकल्प तलाशने का मौका मिल गया है.

जेडीयू से नाराज चल रही है एलजेपी एलजेपी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जेडीयू से नाराज चल रही है क्योंकि उसका मानना है कि एनडीए साझेदारों के बीच सीटों के बंटवारे संबंधी बातचीत में राज्य में उसकी उचित मजबूती को सहयोगी ने तवज्जो नहीं दी है.

जहां बीजेपी और एलजेपी के बीच समीकरण ठीक हैं. वहीं नीतीश कुमार की पार्टी चिराग पासवान द्वारा मुख्यमंत्री की बार-बार आलोचना किए जाने को लेकर गुस्से में है और पार्टी ने इशारा किया है कि बीजेपी को राज्य में उनके अलावा किसी और को देखना चाहिए.

जेडीयू के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “एलजेपी बिहार में अपनी ताकत को ज्यादा आंक रही है और चिराग पासवान ज्यादा महत्वकांक्षी हो रहे हैं.  यह जेडीयू की कभी भी सहयोगी नहीं रही.  वह बीजेपी के साथ समय-समय पर गठबंधन करती रहती है और बीजेपी उसकी मांगों को देखेगी न कि हम. ’’

एलजेपी का नेतृत्व चिराग के हाथ में है केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पार्टी, जिसका नेतृत्व अब उनके बेटे चिराग कर रहे हैं, एलजेपी 2015 में विधानसभा की 243 सीटों में से 42 पर चुनाव लड़ा था और आगामी चुनाव में इसी तरह की साझेदारी चाहती है जिससे जेडीयू इनकार कर रही है. बता दें जेडीयू 2015 में आरजेडी और कांग्रेस वाले खेमे में थी.

जेडीयू सूत्रों ने कहा कि एलजेपी ने 2015 में केवल दो सीटें जीती थी और इसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2005 में था जब पार्टी ने बिहार चुनाव में अपने दम पर लड़ते हुए 29 सीटें जीती थी.

खंडित जनादेश के कारण अगले कुछ महीनों में फिर से विधानसभा चुनाव हुए थे जिसमें नीतीश कुमार ने एनडीए का नेतृत्व करते हुए आरजेडी के लालू प्रसाद को हराकर पहली बार राज्य में गठबंधन को जीत दिलाई थी. इस चुनाव में एलजेपी को महज 10 सीटें मिली थी.

वहीं, एलजेपी का कहना है कि 2014 में जेडीयू को लोकसभा की महज दो सीटें मिलने के बावजूद उसे 2019 के आम चुनाव में 40 में से 19 सीट पर चुनाव लड़ने दिया गया जब वह चार साल बाद फिर से एनडीए में शामिल हो गई थी.

बीजेपी सहयोगियों को साथ रखना चाहती है  जहां बीजेपी अपने गठबंधन सहयोगियों को साथ रखने की दिशा में काम कर रही है वहीं उसके शीर्ष नेताओं ने बार-बार नीतीश कुमार के नेतृत्व में भरोसा जताया है और उन्हें एनडीए के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर नामित किया है.

राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि इस वजह से बीजेपी, एलजेपी को तसल्ली देने में बहुत कामयाब नहीं हो पा रही है. पासवान परिवार अब तक बीजेपी की तारीफ करता रहा है और केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “गरीब अनुकूल” नीतियों की शुक्रवार को भी तारीफ की.

एलजेपी के एक नेता ने कहा कि एलजेपी बिहार चुनाव में अपने एनडीए सहयोगियों से सिर्फ “सम्मानीय समझौता” चाहती है.

हालांकि, बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने एलजेपी के आक्रामक रुख का यह कहते हुए बचाव किया है कि किसी गठबंधन में अपनी सीटों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए यह किसी पार्टी का “सामान्य तेवर” हैं. उन्होंने कहा, “सभी दल अधिकतम सीट पर लड़ना चाहते हैं ताकि वे चुनाव के बाद मजबूत स्थिति में रहें. ”

कांग्रेस की बिहार इकाई के नेता अखिलेश प्रसाद सिंह ने अपने उस दावे के साथ हाल ही में अटकलों का दौर शुरू कर दिया था कि उन्होंने उभरती राजनीतिक स्थिति के बारे में एलजेपी नेतृत्व से बातचीत की है और पूर्व सांसद पप्पू यादव अपनी ही पार्टी, जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के साथ चिराग पासवान को मुख्यमंत्री पद का संभावित दावेदार स्वीकार करने की बात कर रहे हैं.

आरजेडी खेमे में हालात नाजुक  वहीं आरजेडी नीत विपक्ष में, कुछ दलों ने तेजस्वी यादव को गठबंधन का मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाए जाने के प्रति अनिच्छा दिखाई है और सहयोगियों के बीच चर्चा कराने की मांग की है.

सूत्रों ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री एवं हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेकुलर) नेता जीतन राम मांझी जो आरजेडी नेतृत्व पर निशाना साधते रहते हैं, वह जेडीयू के करीब आ रहे हैं.

विपक्षी खेमे के दो और सदस्य, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के मुकेश साहनी ने भी नेृतृत्व के मुद्दे पर विरोध जताया है जो विपक्षी खेमे में संकट के संकेत देता है.

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