दिल्ली के विवेक विहार इलाके में सोमवार (4 मई) का दिन भारी गम और गुस्से के साथ बीता. रविवार तड़के 4 मंजिला इमारत में लगी भीषण आग ने 9 लोगों की जान ले ली. हादसे के बाद बचे हुए लोग और मृतकों के परिजन लगातार आपातकालीन व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि अगर समय पर मदद मिलती, तो कई जानें बच सकती थीं.
स्थानीय लोगों का दावा है कि आग लगने के काफी देर बाद तक अंदर फंसे लोग जिंदा थे और लगातार मदद की गुहार लगा रहे थे. लेकिन राहत और बचाव कार्य में देरी और कमियों के कारण उन्हें बाहर नहीं निकाला जा सका. 4 मंजिला इस इमारत में आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते ऊपरी मंजिलें पूरी तरह चपेट में आ गईं.
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दमकल पर देरी और लापरवाही के आरोप
इमारत के पीछे अपर ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले कमल गोयल ने बताया कि आग उनके घर के ऊपर वाली मंजिल से शुरू हुई थी. उन्होंने आरोप लगाया, “दमकल की गाड़ी फोन करने के कम से कम 20 मिनट बाद आई और आने के बाद भी उन्हें अपने उपकरण सेट करने में लगभग 30 मिनट लग गए. पानी का दबाव बहुत कम था और पाइप लीक हो रहे थे.” उनका कहना है कि एक घंटे से भी कम समय में आग ऊपर तक फैल गई और हालात बेकाबू हो गए.
इस हादसे में अपने परिवार के 5 सदस्यों को खोने वाली सोनाली जैन का दर्द बेहद गहरा है. उन्होंने बताया, “आंचल का अपने पिता को आखिरी फोन सुबह करीब 4.30 बजे आया था. इसका मतलब है कि वे 4.30 बजे तक जीवित थे.”
मृतकों में उनके रिश्तेदार अरविंद जैन (60), अनीता जैन (58), निशांत जैन (35), उनकी पत्नी आंचल जैन (33) और उनका छोटा बच्चा अकाय शामिल हैं.
'फोन पर आखिरी बातचीत, फिर सब खत्म'
कमल गोयल ने आग के दौरान निशांत जैन से हुई बातचीत को याद करते हुए कहा, “वह बार-बार पूछ रहा था कि क्या दमकल की गाड़ी आ गई है. मैंने उसे बताया कि वे आ गए हैं, लेकिन उसने कहा कि आग बहुत ज्यादा फैल गई है. मैंने उसे वेंटिलेशन के लिए पीछे की ग्रिल की ओर जाने को कहा, लेकिन वे वहां तक नहीं पहुंच सके. उसके बाद, उसका फोन लगना बंद हो गया.”
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मौके पर जरूरी उपकरण नहीं थे. खासकर मेटल कटर की कमी और बिजली कटने के कारण शुरुआती समय में काम नहीं हो सका.
सोनाली जैन ने कहा, “मेरे घर में कोई डिजिटल लॉक नहीं थे. दरवाजे लकड़ी के थे, लेकिन गर्मी के कारण वे जाम हो गए थे. कटर समय पर नहीं आए, दरवाजा तोड़ा नहीं जा सका.”
एक ही रास्ता बना मुसीबत
इमारत की बनावट भी इस हादसे में बड़ी वजह बनकर सामने आई. 330 वर्ग गज में बनी इस बिल्डिंग में कुल 8 फ्लैट थे, 4 आगे और 4 पीछे. लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि अंदर आने और बाहर जाने का सिर्फ एक ही रास्ता था.
आग फैलने के बाद यही रास्ता बंद हो गया और लोग फंस गए. इमारत के सबसे ऊपर रहने वाले 60 वर्षीय सुधीर कुमार मित्तल ने बताया कि उनका परिवार लंबे समय तक बालकनी में फंसा रहा.
उन्होंने कहा, “हम 5 लोग मैं, मेरी पत्नी, मेरा पोता, बेटी और पुत्रवधू, बालकनी में लगभग एक घंटे से इंतजार कर रहे थे. बाद में एक क्रेन आई लेकिन मैं अपनी स्थिति के कारण उस पर नहीं चढ़ सका. बाद में ट्रॉली फिर से आई और मेरे परिवार को बचाया गया.” उन्होंने बताया कि आग इतनी भयानक थी कि उनके घर के सात एसी तक पिघल गए.
अग्निशमन विभाग ने आरोपों को नकारा
वहीं दूसरी तरफ दिल्ली अग्निशमन सेवा ने सभी आरोपों को खारिज किया है. अग्निशमन अधिकारी मुकेश वर्मा ने कहा, “ऐसी कोई समस्या हमारे संज्ञान में नहीं आई. हमने कई स्टेशनों शाहदरा, ताहिरपुर, गोकुलपुरी और लक्ष्मी नगर से गाड़ियां भेजी थीं और वे दूरी के आधार पर एक-एक करके पहुंचीं. पहली गाड़ी 5 से 6 मिनट के भीतर पहुंच गई थी.” उन्होंने यह भी कहा कि पानी की कोई कमी नहीं थी और सभी उपकरण सही तरीके से काम कर रहे थे.
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धुएं से दम घुटने से हुई मौतें
वर्मा के अनुसार, आग की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि तुरंत अंदर जाना मुश्किल था. उन्होंने बताया कि कई लोगों की मौत आग से नहीं बल्कि धुएं के कारण दम घुटने से हुई. उन्होंने कहा कि कुल 14 गाड़ियां मौके पर भेजी गई थीं और लगभग 15 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया.
