दिल्ली हाई कोर्ट ने निजामुद्दीन स्थित करीब 500 साल पुरानी हजरत भूरे शाह दरगाह के आसपास हुए ढांचे के विध्वंस को लेकर बड़ा कदम उठाया है. अदालत ने पाया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड का अभी का रुख उसके ही 2023 की रिपोर्ट से बिल्कुल अलग है. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने यह मामला दिल्ली सरकार की धार्मिक समिति को फिर से भेज दिया है, ताकि वह सभी तथ्यों और पक्षों को ध्यान में रखकर निर्णय ले सके.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल दरगाह के मुतवल्ली यूसुफ बेग की याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें उन्होंने दावा किया कि दरगाह 500 साल पुरानी है और इसे 1976 के दिल्ली गजट में वक्फ भूमि के रूप में अधिसूचित किया गया था.

अप्रैल 2023 में PWD ने G20 सम्मेलन की तैयारियों के दौरान दरगाह का एक ढांचा तोड़ दिया था. बेग ने इस कार्रवाई को अवैध बताते हुए 10 लाख रुपये हर्जाने की मांग की, जिसे अदालत ने ठुकरा दिया.

निरीक्षण और वक्फ बोर्ड का विरोधाभासी रुख

जून 2023 में कोर्ट के आदेश पर PWD, MCD, जिला मजिस्ट्रेट, L&DO और वक्फ बोर्ड की टीम ने स्थल का निरीक्षण भी किया. इंडियन एक्सप्रेस को अनुसार, उस रिपोर्ट में अधिकतर विभागों ने इसे सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण बताया, लेकिन वक्फ बोर्ड ने कहा कि दरगाह पूरी तरह वैध है और तोड़फोड़ अवैध थी.

जुलाई 2023 की धार्मिक समिति की बैठक में पाया गया कि कब्रों और मजारों की वजह से पैदल यात्रियों की आवाजाही बाधित होती है. समिति ने सुझाव दिया कि इन कब्रों को किसी और स्थान पर स्थानांतरित किया जाए.

हालांकि मई 2024 में वक्फ बोर्ड ने अपना रुख बदलते हुए समिति की सिफारिशों को “न्यायसंगत और संवेदनशील” बताया. बोर्ड ने स्वीकार किया कि गजट अधिसूचना में मजार की सटीक सीमा और नक्शा मौजूद नहीं है.

अब हाई कोर्ट के आदेश के बाद क्या होगा?

न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने 4 सितंबर को आदेश दिया कि यह मामला पुनः धार्मिक समिति के पास जाएगा. समिति अब वक्फ बोर्ड, अन्य सरकारी एजेंसियों और याचिकाकर्ता यूसुफ बैग की दलीलों को सुनकर अंतिम निर्णय लेगी. अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी संबंधित पक्षों के बीच उभरे नए तथ्यों को ध्यान में रखकर ही कोई ठोस कदम उठाया जाए.

अब धार्मिक समिति की आगामी कार्रवाई ही यह तय करेगी कि यह मामला धार्मिक आस्था और सार्वजनिक हित के बीच किस तरह संतुलित किया जाएगा.