बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को बिहार में एक बड़े विकल्प के तौर पर उभारा है. वहीं, इन नतीजों ने बीजेपी को बड़ा झटका दिया है. ये वही बीजेपी है जो नीतीश कुमार के राज में पटना की चारों शहरी विधानसभा सीटों (पटना साहिब, बांकीपुर, कुम्हरार और दीघा) पर अपना दबदबा बनाए रखी. नीतीश के जाते ही पार्टी को सालों बाद बांकीपुर से बड़ा झटका भी मिल गया.
ये नतीजे बीजेपी के लिए किसी सबक से कम नहीं है, जो अपने उन्हीं पुराने रागों को इस उपचुनाव में भी दोहराती नजर आई, लेकिन प्रशांत किशोर ने अन्य दलों से हटकर बदलाव की राजनीति को केंद्र में रखा. बीजेपी की हार के पीछे उसकी कमजोर रणनीति, सत्ता विरोधी लहर, सवर्णों की नाराजगी के सात साथ प्रशांत किशोर की एक रणनीति भी रही है. ऐसे में सभी के मन में यही सवाल है कि आखिर कैसे पीके ने बीजेपी को उसके गढ़ में हराया और अब बीजेपी इससे क्या सबक लेगी.
बीजेपी का फीका प्रचार, पीके के 'बदलाव' का वार
प्रशांत किशोर के लिए इस सीट से जीत दर्ज करना उनकी साख की लड़ाई बन चुका था इसलिए उन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया. महीनों तक जनता के बीच गए उनकी समस्याओं को सुना और इलाके के लोगों को अपना पूरा समय दिया. जन सुराज ने इस चुनाव को 'बदलाव' और 'जनसंपर्क' के रूप में देखा. वहीं, बीजेपी ने इसे केवल एक सीट की तरह देखा, जो उसका गढ़ रहा है. बीजेपी ने अपने पुराने प्रदर्शन और संगठन पर भरोसा करते हुए किसी नई रणनीति पर काम नहीं किया, जिससे उसकी रणनीति कमजोर नजर आती है. एक तरह से कहें तो पार्टी का बूथ स्तर प्रदर्शन काफी कमजोर साबित हुआ.
यहीं नहीं आखिर समय में पार्टी को अपना उम्मीदवार तक बदलना पड़ा, जिसका विपक्ष ने फायदा उठाते हुए इसे बीजेपी की घबराहट और आंतरिक मतभेद की तरह पेश किया. बांकीपुर की जनता ने भी इस उम्मीदवार पर अपना भरोसा नहीं दिखाया. ऐसे में बीजेपी को अपने प्रदर्शन की गहरी समीक्षा की आवश्यकता है.
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पारंपरिक समर्थन को फिर से साधने की चुनौती
बांकिपुर की बात करें तो यहां सवर्ण मतदाताओं की संख्या अधिक हैं (कायस्थ 14 प्रतिशत, ब्राह्मण 6-7%, भूमिहार 7-8% और राजपूत 5-7%). नीतीश कुमार ओबीसी समुदाय से थे, लेकिन वो ओबीसी, ईबीसी और सवर्णों को एकजुट रखने में सफल रहे. वहीं, सम्राट चौधरी के लिए नीतीश के अंदाज को अपनाना आसान नहीं है. इसके अलावा जिस तरह से पिछले कुछ समय से पेपर लीक और विश्वविद्यालय परिसरों में स्थगित किये जा चुके जातिय भेदभाव से जुड़े यूजीसी नियम जैसे मामले सामने आये, उससे सवर्ण और मध्यमवर्गीय परिवार के युवाओं के अलावा अन्य जाति के युवा भी प्रभावित हुए हैं. इससे इन जातियों में बीजेपी के प्रति नाराजगी बढ़ी है, जिसका सीधा असर चुनाव के नतीजों पर पड़ा है. अब माना जा रहा है कि बीजेपी अपने पारंपरिक समर्थन के आधार को फिर से साधने के लिए अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव कर सकती है.
शहरी मतदाताओं में असंतोष पड़ा भारी
बांकीपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में रहने वाले मतदाताओं के लिए शिक्षा, रोजगार, परीक्षा, ट्रैफिक, बुनियादी सुविधायें जैसे मुद्दे काफी महत्वपूर्ण होते हैं. ये बीजेपी के बड़े समर्थक भी रहे हैं और ये जातिगत राजनीति के आधार पर वोट नहीं देते. बीजेपी सालों से सत्ता में है, लेकिन अपेक्षा के अनुसार वो मतदाताओं की मांगों को पूरा नहीं सकी है, जिससे सत्ता विरोधी लहर बढ़ी है. पेपर लीक और युवाओं से जुड़े मुद्दों ने इस नाराजगी को और बढ़ावा दिया है. जन सुराज ने इसे भांपा और उसी अनुसार रणनीति बनाई. जन सुराज ने 'जन संपर्क' अभियान के जरिए लोगों की मांगों को सुना, उनकी आवश्यकताओं तो समझा. प्रशांत किशोर ने 'बदलाव' की बात की जिससे उनकी छवि पारंपरिक नेताओं से अलग नीति आधारित बनी. नतीजा ये हुआ कि जनसुराज ने बीजेपी के पारंपरिक वोटबैंक में सेंधमारी की.
एक तरह से कहें तो शहरी मतदाताओं ने जन सुराज को वोट देकर बीजेपी को संदेश दिया है कि वो अब अन्य राजनीतिक विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं. ऐसे में बीजेपी अगर आगे भी शहरी मतदाताओं के मद्दों को प्रथमिकता नहीं देती तो शायद उसके लिए परेशानी बढ़ने वाली हैं. माना जा रहा है कि बीजेपी अपनी रणनीति में बदलाव पर विचार कर सकती है.
कुल मिलाकर बांकीपुर के मतदाताओं ने बीजेपी को संदेश दिया है कि वो केवल गढ़ और पुराने घिसे पिटे वादों से चुनाव नहीं जीत सकती. उसे वास्तव में जमीनी स्तर पर काम करना होगा, युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार के साथ साथ शहर में विकास के लिए काम करना होगा.
