बिहार सरकार सूबे की शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रही है. स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर मानव संसाधन तक, हर मद में करोड़ों का बजट खर्च किया जा रहा है, लेकिन बांका जिले में विभागीय सुस्ती और लापरवाही सरकार के इन मंसूबों पर पानी फेर रही है. यहां 'शिक्षा सेवक' (टोला सेवक) सरकारी नियमों को ठेंगा दिखाकर अपनी मनमानी चला रहे हैं. जिले के ज्यादातर स्कूलों में शिक्षा सेवक और तालिमी मरकज के कर्मी पिछले चार सालों से भी अधिक समय से एक ही विद्यालय में जमे हुए हैं. सरकारी नियमावली के अनुसार एक विद्यालय में इनका कार्यकाल सीमित होता है.

​नियम 3 साल का… टिके हैं 4 साल से

सरकारी प्रावधानों और रोटेशन पॉलिसी के तहत शिक्षा सेवकों का स्थानांतरण समय-समय पर अनिवार्य है ताकि पारदर्शिता बनी रहे, लेकिन बांका में ये कर्मी एक ही जगह जमे हुए हैं. जिस उद्देश्य से (महादलित और अल्पसंख्यक बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए) इनकी बहाली हुई थी, वह पूरा नहीं हो रहा है. 

क्या बोले जिम्मेदार अधिकारी?

इस पूरे मामले पर शिक्षा विभाग के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (साक्षरता डीपीओ) संजय कुमार यादव ने बड़ी जानकारी दी है. उन्होंने स्वीकार किया कि रोटेशन का नियम है. ​डीपीओ संजय कुमार यादव ने कहा, "नियमावली के तहत शिक्षा सेवक अधिकतम 3 वर्ष तक ही एक विद्यालय में रह सकते हैं. इस दिशा में कार्रवाई करते हुए कुछ शिक्षा सेवकों का स्थानांतरण किया गया है, जबकि शेष के स्थानांतरण के लिए विभागीय प्रक्रिया चल रही है."

अप्रैल में होगा बड़ा फेरबदल

डीपीओ ने साफ किया कि विभाग इस मुद्दे पर गंभीर है. उन्होंने दावा किया कि अप्रैल महीने में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही शेष बचे सभी शिक्षा सेवकों और तालिमी मरकज कर्मियों का स्थानांतरण कर दिया जाएगा. 

बता दें कि शिक्षा सेवक का मुख्य कार्य अपने समुदाय के बच्चों को विद्यालय से जोड़ना एवं प्रतिदिन उन्हें भयमुक्त वातावरण में विद्यालय लाना और ले जाना तथा एक घंटा उन बच्चों को जहां सभी बच्चे उपस्थित हो सके वहां उन्हें मुफ्त कोचिंग करवाना है. साथ ही अक्षर आंचल योजना के तहत निरक्षर महिलाओं को साक्षर बनाना है.