बिहार में पूर्ण शराबबंदी (Liquor Ban) लागू हुए आज पूरे 10 साल हो गए हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं (जीविका दीदियों) की मांग पर घरेलू हिंसा और सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के उद्देश्य से 1 अप्रैल 2016 को देशी और 5 अप्रैल 2016 से विदेशी शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था.

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इन 10 सालों में शराबबंदी कानून ने कई उतार-चढ़ाव देखे. लाखों गिरफ्तारियां हुईं, जहरीली शराब से मौतें हुईं और विपक्ष के तीखे हमले भी झेले. लेकिन, इन सबके बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस फैसले पर बिना कोई समझौता किए चट्टान की तरह अडिग रहे.

10 सालों के आंकड़े

शराबबंदी को सफल बनाने के लिए बिहार सरकार ने कड़े कानून बनाए, जिसमें शराब पीने या बेचने पर तुरंत जेल का प्रावधान किया गया. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 सालों में पुलिस और उत्पाद विभाग ने जबरदस्त कार्रवाई की है. पूरे राज्य में 11 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए. 16 लाख से अधिक लोगों को शराब पीने या तस्करी के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. अब तक 10 करोड़ लीटर से ज्यादा अवैध शराब बरामद की जा चुकी है.

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शराब माफियाओं और तस्करों पर नकेल कसने के लिए थानों की जवाबदेही तय की गई, साथ ही ड्रोन और हेलीकॉप्टर तक से ग्रामीण व दियारा इलाकों में निगरानी की गई. कुछ मामलों में पीने वालों को जुर्माना देकर छोड़ने जैसी मामूली राहत भी दी गई, लेकिन कानून की मूल सख्ती बरकरार रही.

जहरीली शराब का कहर

पूर्ण शराबबंदी के इस दशक का एक स्याह पहलू 'जहरीली शराब' (Hooch Tragedies) भी रहा है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2016 से अब तक जहरीली शराब पीने से 354 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

सबसे ज्यादा 156 मौतें साल 2016 में ही हुई थीं. 2022 में जहरीली शराब कांड ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं, जब 100 से अधिक लोगों की जान गई. 2023 में 35 और 2024 में 25 मौतें दर्ज की गईं. इसी महीने अप्रैल 2026 में मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) में जहरीली शराब से 10 लोगों की दर्दनाक मौत और कई लोगों के बीमार होने की खबर सामने आई है.

विपक्ष और अपनों के निशाने पर नीतीश

शराबबंदी को लेकर मुख्यमंत्री हमेशा राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर रहे. कभी साथ रहे तो कभी विपक्ष में बैठे दलों ने होम डिलीवरी और अवैध शराब की बिक्री को लेकर सरकार को घेरा. यहां तक कि जीतन राम मांझी और बीजेपी नेता नीरज बबलू जैसे सत्ता पक्ष के लोगों ने भी इस कानून पर सवाल उठाए. दलित बस्तियों में शराब चुलाई के नाम पर होने वाली गिरफ्तारियों को लेकर भी सरकार की जमकर आलोचना हुई, लेकिन नीतीश कुमार ने अपना रुख नरम नहीं किया.

आधी आबादी का भरपूर साथ, साबित हुआ 'सियासी मास्टरस्ट्रोक'

लाख विरोध और खामियों के बावजूद, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर शराबबंदी नीतीश कुमार का सबसे बड़ा 'मास्टरस्ट्रोक' साबित हुआ है. महिलाओं की जिस मांग पर यह फैसला लिया गया था, उस आधी आबादी (महिला वोटरों) ने पिछले 10 सालों में हुए दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार को भरपूर समर्थन दिया है. 2026 के चुनावों में भी महिलाओं का यह सपोर्ट साफ तौर पर देखा गया.

मोतिहारी त्रासदी के बाद भी जब महिलाओं से बात की गई, तो उनका स्पष्ट कहना था कि शराबबंदी उनके लिए एक वरदान है. चोरी-छिपे शराब जरूर बिकती है, लेकिन पुलिस और जेल के खौफ से शराबी अब खुलेआम हंगामा या गलत काम करने से डरते हैं. कुल मिलाकर, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो शराबबंदी ने बिहार की आम जनता, विशेषकर महिलाओं को एक बड़ी सामाजिक राहत और सुरक्षा का अहसास दिया है.