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आलस को मानते हैं मानसिक बीमारी, जानें जापान की 7 आदतें जो लोगों को हमेशा रखती हैं एक्टिव

कविता गाडरी   |  01 Jan 2026 09:01 AM (IST)
आलस को मानते हैं मानसिक बीमारी, जानें जापान की 7 आदतें जो लोगों को हमेशा रखती हैं एक्टिव

पारंपरिक जापानी मान्यताओं में आलस को सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति के तौर पर देखा जाता है जो इंसान का फोकस, दिशा और अंदरूनी ताकत कमजोर कर देता है. इसी सोच के चलते लोग रोजमर्रा में ऐसी दिनचर्या अपनाते हैं, जिससे शारीरिक सक्रियता और मानसिक एकाग्रता बनी रहती है. इन आदतों की मदद से लोग तब भी संतुलन बनाए रखते हैं, जब उनका मोटिवेशन सबसे कम होता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको ऐसी सात आदतों के बारे में बताते हैं, जो आलस को दूर रखने में मदद करती है.

1

कई जापानी लोग इकिगाई की अवधारणा को एक सहारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जो उन्हें अलस में डूबने से बचाता है. इकिगाई जुनून, काबिलियत और आजीविका के बीच संतुलन को दर्शाता है. जिन लोगों को अपने जीवन का मकसद स्पष्ट होता है, वह दिन की शुरुआत टालने की बजाय उत्साह के साथ करते हैं. रिसर्च के अनुसार जीवन का स्पष्ट उद्देश्य मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाता है और अवसाद जैसी समस्याओं के खतरे को कम करता है.

2

वहीं जापान की काइजेन पद्धति में बड़ी पैमाने पर बदलाव करने की बजाए, छोटे-छोटे सुधारों के माध्यम से निरंतर विकास किया जाता है. जैसे 1 मिनट की सफाई, 2 मिनट की वॉक यह छोटे काम दिमाग के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल होते हैं और धीरे-धीरे आदत बन जाते हैं. यह तरीका टालमटोल को कम करने में मदद करता है.

3

जापानी शुकान का मतलब आदत या नियमित लाइफस्टाइल होती है. इसमें तय समय पर उठना, काम के लिए समय तय करना और रोजाना सफाई जैसे काम दिन को एक लय में चलने में मदद करते हैं. इससे बार-बार फैसला लेने की जरूरत कम होती है और मानसिक थकान भी घटती है. रिसर्च बताती है कि ऐसी तय लाइफस्टाइल से फोकस और प्रोडक्टिविटी बेहतर होती है.

4

जापानी संस्कृति में सार्वजनिक स्थान स्कूल परिसरों और ऑफिस में साफ सफाई को लेकर बढ़ावा दिया जाता है. जापानी संस्कृति में 5s मेथड यानी Sort, Set in order, Shine, Standardize, Sustain के जरिए काम की जगह को व्यवस्थित रखा जाता है. साफ और व्यवस्थित माहौल काम शुरू करने में रुकावट कम करता है. रिसर्च के अनुसार अवस्थित जगह तनाव और ध्यान भटकने का कारण बनती है.

5

वहीं प्राचीन समुराई दर्शन में आलस को एक आध्यात्मिक बीमारी माना जाता था, जो हार्ट, मन और आत्मा को प्रभावित करती है. मान्यता है कि रुकना सड़न की शुरुआत है, जैसे ठहरा पानी गंदा हो जाता है. इसलिए छोटे-छोटे लेकिन लगातार मूवमेंट पर जोर दिया जाता है. समुराई ट्रेनिंग में बिना ज्यादा सोचे तुरंत पहला कदम उठाने की सीख दी जाती है.

6

समय का सम्मान करना जापान की संस्कृति का अहम हिस्सा है. जापान में समय को खुद और दूसरों के प्रति सम्मान की तरह देखा जाता है, इससे लोग काम, आराम, सीखने और व्यायाम करने का सही इस्तेमाल करते हैं. रिसर्च बताती है कि समय की प्लानिंग और पंक्चुअलिटी से प्रोडक्टिविटी बढ़ती है और टालमटोल कम होती है.

7

वहीं रोज शाम को खुद से सवाल करना और जर्नल लिखना आम दिनचर्या का जरूरी हिस्सा है. इससे आत्म जागरूकता बढ़ती है और इंसान अपनी जिम्मेदारी समझता है. यह आदत बहाने बनाने की प्रवृत्ति को कम करती है और आलस के संकेतों को समय रहते पहचानने में मदद करती है.

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