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ऋषि, मुनि, साधु, संत, संन्यासी और योगी में क्या अंतर होता है? जानिए आसान भाषा में!

अंकुर अग्निहोत्री   |  10 Sep 2025 08:30 AM (IST)
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ऋषि, मुनि, योगी, साधु, संत और संन्यासी के बीच अधिकतर लोग अंतर नहीं कर पाते हैं. आज के इस लेख के माध्यम से हम आपको भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के के जरिए इन सवाल का जवाब देंगे.

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ऋषि वे होते हैं, जिन्होंने कठिन तपस्या और ध्यान के जरिए ब्रह्मांडीय सत्य और वेदों के मंत्रों का साक्षात्कार किया. इसलिए ऋषियों को मंत्रद्रष्टा भी कहा जाता है. उन्होंने कई क्षेत्रों में शोध किए. जैसे- चरक ऋषि ने चरक संहिता रची थी, ठीक उसी तरह पतंजलि ऋषि ने योगसूत्र की रचना की. कणाद ऋषि ने ही सबसे पहले बताया था कि प्रत्येक वस्तु सूक्ष्म कणों से बनी हुई है, जिन्हें अणु कहा जाता है. ऋषियों को ज्ञान और तपस्या के आधार पर 4 वर्गों में बांटा गया.

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राजर्षि ऐसे राजा जो लोगों के बीच रहते हुए भी गहरे ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं. उदाहरण राजा जनक. महर्षि, ऐसे ऋषि जिन्होंने गहरे ज्ञान और तपस्या के बल पर असाधारण सिद्धियां प्राप्त की. उदाहरण के लिए महर्षि वेद व्यास और महर्षि विश्वामित्र. ब्रह्मर्षि, ऋषियों का सबसे सर्वोच्च स्तर है. ब्रह्मर्षि वो होते हैं, जिन्हें ब्रह्म का साक्षात्कार प्राप्त किया हो. देवर्षि, ऐसे ऋषि होते हैं, जो तीनों लोकों में विचरण कर सकते हैं. उदाहरण देवर्षि नारद.

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मुनि वो हैं जो गहन मौन, साधना और ध्यान में लीन हैं. ये अनावश्यक चीजों और वाणी से दूर रहते हैं और अपने मन को ईश्वर से जोड़ने का प्रयास करते हैं. शास्त्रों में मुनियों के लिए कहा गया है कि, मौनं तपो मुनि यानी मौन ही मुनि की तपस्या है.

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योगी वो है जो योग साधना के जरिए आत्मा और परमात्म से मिलने का संगम करता है. एक योगी का जीवन संतुलन, साधना और अनुशासन का प्रतीक होता है. वो मन, शरीर और प्राण पर नियंत्रण रखता है.

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साधु वो है जिसने सांसारिक मोह का त्याग करके सेवा, धर्म और भक्ति का मार्ग अपनाया हो.

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संन्यासी वो है, जिसने परिवार, धन और पद सबकुछ त्याग दिया हो. वो अपना जीवन यापन भिक्षा मांगकर करते हैं और तपस्या-साधना में लीन रहते हैं.

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संत वो है जिसने सत्य और ईश्वार का प्रत्यक्ष अनुभव किया हो. और उसे प्रेम और भक्ति के रूप में समाज में पहुंचाया हो.

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