Mahabharat: परिवार के लिए समर्पण कैसा हो? महाभारत में भीम ने दिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण

महाभारत कथा
लाक्षागृह की भीषण आग से सुरक्षित निकलने के बाद पांडव अपनी माता कुंती के साथ घने जंगलों में भटक रहे थे. वे लगातार स्थान बदल रहे थे ताकि कोई उन्हें पहचान न सके. कई दिनों की थकान, भूख और अनिश्चितता ने सभी को कमजोर कर दिया था, लेकिन जीवित रहने की आशा उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति दे रही थी.
लंबी यात्रा और भीषण थकान के बीच कुंती को तेज प्यास लगी. उन्होंने अपने पुत्रों से पानी लाने की बात कही. माता की व्याकुलता देखकर भीम तुरंत जल की खोज में निकल पड़े. वे जंगल के भीतर दूर तक गए और चारों ओर ध्यान से देखने लगे कि कहीं कोई नदी, तालाब या जलस्रोत दिखाई दे जाए.
कुछ दूर जाने पर भीम को एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया, जिसके किनारे सारस पक्षी विचरण कर रहे थे. उन्होंने अनुमान लगाया कि यह स्थान सुरक्षित है. भीम ने जल पिया, फिर अपनी माता और भाइयों के लिए वस्त्र में पानी भरकर वापस लौटे. उनका उद्देश्य था कि परिवार की प्यास जल्द से जल्द बुझ सके.
जब भीम लौटकर आए, तब उन्होंने एक भावुक दृश्य देखा. कुंती और उनके चारों भाई अत्यधिक थकान के कारण भूमि पर ही गहरी नींद में सो चुके थे. राजमहलों में रहने वाले ये लोग अब जंगल की कठोर परिस्थितियों में विश्राम कर रहे थे. यह दृश्य देखकर भीम का हृदय दुःख और करुणा से भर उठा.
अपने परिवार की ऐसी अवस्था देखकर भीम के मन में कौरवों के प्रति प्रचंड क्रोध उत्पन्न हुआ. उन्हें याद आया कि कैसे छलपूर्वक उन्हें लाक्षागृह में जलाने का प्रयास किया गया था. उन्होंने मन ही मन प्रण किया कि एक दिन वे इस अन्याय का उत्तर अवश्य देंगे और अपने परिवार को सम्मान और सुरक्षा दिलाकर रहेंगे.
परिवार का प्यार और साथ हर कठिनाई को सहने की ताकत देता है. भीम ने अपनी थकान और परेशानियों की परवाह किए बिना माता और भाइयों की चिंता की. यह प्रसंग सिखाता है कि अपने प्रियजनों के प्रति समर्पण और जिम्मेदारी का भाव हमें सबसे कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस देता है.