तेजी से बढ़ रहे हैं कोरोना के मामले, क्या एक लाख केस होने पर लग जाता है लॉकडाउन?
ऐसी स्थिति जिसमें, ह्यूमन कम्युनिटी को खतरा पैदा हो जाए, उस गंभीर खतरे से बचाने या रोकथाम के लिए लाॅकडाउन का यूज किया जाता है. इमरजेंसी में लिया जाने वाला ये फैसला लोगों को सामाजिक ताैर पर एक-दूसरे से मिलने-जुलने से रोकता है. लोगों की सुरक्षा के लिए ये पाबंदियां ही लाॅकडाउन की स्थिति कही जाती है.
कोरोना के बढ़ते केसेज के बीच जो सबसे बड़ा सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि लाॅकडाउन कब लगता है? लाॅकडाउन की स्थिति हालातों पर डिपेंड कर सकती है.
अगर किसी खतरे या वजह के चलते मोर्टलिटी रेट बढ़ती है या सामाजिक ताैर पर हालात भयावह और बेकाबू होने की आशंका बनती है, तो सरकारें लोगों की रक्षा के लिए आखिरी विकल्प के ताैर पर लाॅकडाउन का इस्तेमाल कर सकती हैं.
ऐसे में लाॅकडाउन के तहत पाबंदियां लागू कर दी जाती हैं, जिसमें पब्लिक प्लेसेज मार्केट, बैंक, ट्रांसपोर्टेशन आदि को बंद कर दिया जाता है. सोशल गेदरिंग पर रोक लगा दी जाती है. कंप्लीट लाॅकडाउन की स्थिति में लोगों के घर से बाहर निकलने पर रोक लग जाती है.
भारत में कोरोना के शुरुआती फेज में लाॅकडाउन लागू किया गया था. कोरोना के मामलों की बढ़ोतरी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मार्च 2020 को जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था. इस दिन अनिवार्य पाबंदी नहीं लगाई गई.
हालांकि, 24 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर में 21 दिनों के पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की थी. इसके बाद लॉकडाउन को कई फेज में आगे बढ़ाया गया. कोरोना महामारी के दौरान भारत में करीब 68 दिनों तक पूर्ण लॉकडाउन रहा.
देश में लॉकडाउन के दौरान यातायात और परिवहन की सुविधा लगभग बंद हो गईं थी. अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू उड़ानें, बस ट्रेन सभी सेवाएं ठप पड़ गई थीं. जरूरी चीजों को छोड़कर मॉल और दुकानें सभी बंद थे. इसके अलावा उत्पादन और निर्माण क्षेत्र भी ठप पड़ गया था. फैक्ट्रियां बंद होने के कारण बड़े स्तर पर रोजगार पर असर पड़ा. स्कूल, कॉलेज, कोचिंग और अन्य शैक्षिक संस्थान भी पूरी तरह से बंद कर दिए गए थे. ऑनलाइन पढ़ाई को बढ़ावा दिया गया.