पैसेंजर प्लेन में जान बचाने के लिए क्यों नहीं होते पैराशूट, फाइटर जेट वाला फॉर्मूला यहां क्यों हो जाता है फेल?
फाइटर जेट और पैसेंजर प्लेन का काम, डिजाइन और मकसद पूरी तरह अलग होता है. फाइटर जेट आमतौर पर एक या दो पायलट के लिए बनाए जाते हैं, जिनका काम बेहद जोखिम भरे हालात में उड़ान भरना होता है. इसके उलट पैसेंजर प्लेन सैकड़ों यात्रियों को सुरक्षित और आराम से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए डिजाइन किए जाते हैं.
यही फर्क पैराशूट के सवाल की जड़ में छिपा है. फाइटर जेट में पायलट के पास इजेक्शन सीट होती है. खतरे की स्थिति में पायलट सीट समेत बाहर निकल जाता है और पैराशूट खुल जाता है. पायलट को खास ट्रेनिंग दी जाती है कि किस ऊंचाई, किस स्पीड और किस एंगल पर बाहर निकलना सुरक्षित है.
यहां फैसला कुछ सेकंड में लेना होता है और जान बचाने का यही एक तरीका होता है. पैसेंजर प्लेन आमतौर पर 30 हजार से 40 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ते हैं. इस ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन बहुत कम होती है और तापमान शून्य से नीचे चला जाता है.
अगर कोई यात्री अचानक पैराशूट के साथ बाहर कूदे, तो कुछ सेकंड में ही उसे सांस लेने में दिक्कत और ठंड का झटका लग सकता है. बिना खास सूट और ट्रेनिंग के वहां जीवित रहना बेहद मुश्किल है.
कमर्शियल विमान की रफ्तार 800 से 900 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है. इतनी तेज स्पीड पर विमान से बाहर निकलना जानलेवा हो सकता है. हवा का दबाव शरीर को बुरी तरह नुकसान पहुंचा सकता है. साथ ही विमान का डिजाइन ऐसा होता है कि दरवाजे या खिड़कियां हवा में खोलना आसान नहीं होता.
गलत समय पर खुला दरवाजा पूरे विमान की स्थिरता बिगाड़ सकता है. एक पैसेंजर प्लेन में 150 से 400 तक यात्री होते हैं. अगर सभी के लिए पैराशूट रखे जाएं, तो विमान का वजन काफी बढ़ जाएगा. इससे ईंधन खर्च बढ़ेगा और उड़ान महंगी हो जाएगी. इसके अलावा, हर यात्री को पैराशूट इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग देना भी असंभव है.
घबराहट के माहौल में यह उपाय जान बचाने के बजाय और बड़ा खतरा बन सकता है. पैसेंजर विमानों में सुरक्षा के लिए अलग रणनीति अपनाई जाती है. मजबूत एयरफ्रेम, डबल और ट्रिपल सेफ्टी सिस्टम, ऑटोमैटिक कंट्रोल, इमरजेंसी लैंडिंग और स्लाइड्स जैसे उपाय यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं.