History Of Pockets: कपड़े में जेब लगाने का चलन कब से शुरू हुआ, जब नहीं थी पॉकेट तब पैसे कैसे रखते थे लोग?

History Of Pockets: आजकल जेबें कपड़ों का इतना आम हिस्सा बन चुकी हैं कि ज्यादातर लोग शायद ही कभी उनके इतिहास के बारे में सोचते हैं. चाहे जींस हो, शर्ट हो या फिर जैकेट जेब की वजह से हम आसानी से पैसे, चाबी, फोन और दूसरी जरूरी चीजें साथ ले जा पाते हैं. आइए जानते हैं कि कपड़े में जेब लगाने का चलन आखिर कब शुरू हुआ था और जब जेब नहीं थी तब पैसे कहां पर रखते थे लोग.
कपड़ों में जेब सिलने का चलन 1600 के दशक में शुरू हुआ था. दर्जियों ने सबसे पहले पुरुषों के कोट, वेस्टकोट और पतलून के अंदर जेबें लगाईं. इससे पैसे और निजी सामान ले जाने का एक सुरक्षित और सुविधाजनक तरीका बना.
कपड़ों में सिली हुई जेबें आने से पहले लोग सिक्के और कीमती चीजें चमड़े या फिर कपड़े के छोटे पाउच में रखकर कमर पर बांधते थे या फिर बेल्ट से लटकाते थे. ये बाहरी बैग यूरोप और दुनिया के कई दूसरे हिस्सों में आमतौर पर इस्तेमाल किए जाते थे.
जब भीड़भाड़ वाले कस्बों और शहरों में चोरी आम हो गई तो महिलाओं ने बड़ी स्कर्ट, पेटिकोट और ड्रेस के नीचे छिपे हुए पाउच पहनना शुरू कर दिया.
लोग अक्सर पैसे और जरूरी कागज छुपाने के लिए अनोखी जगह का इस्तेमाल करते थे. लंबे मोजे, बूट और कोट या फिर शर्ट की चौड़ी आस्तीनें अक्सर एक तिजोरी का काम करती थीं. यह यात्रा के समय ज्यादा फायदेमंद साबित होते थे.
भारत और एशिया के कई हिस्सों में लोग सिक्कों को और साथ ही कुछ कीमती चीजों को कमर पर बढ़े कपड़े की तहों में रखते थे. कपड़े के इस तरह की बेल्ट कपड़े के साथ पहने जाने वाले सामान और सुरक्षित स्टोरेज का काम करती थी.
20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं के अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलनों ने गहरी और काम की जेबों वाले कपड़ों की मांग की. कार्यकर्ताओं का यह तर्क था कि रोजमर्रा की जरूरत के लिए हैंडबैग पर निर्भर रहने के बजाय महिलाओं को भी पुरुषों जैसी ही सुविधा मिलनी चाहिए.