War Impact On Environment: जंग से पर्यावरण को कितना पहुंचता है नुकसान? मिडिल ईस्ट तनाव के बीच जान लें जवाब

War Impact On Environment: मिडिल ईस्ट में चल रही जंग का असर सिर्फ मानवीय और भू राजनीतिक नुकसान पर ही नहीं पड़ रहा है. इसका बूरा असर पर्यावरण को भी झेलना पड़ रहा है. युद्ध सिर्फ शहरों और इंसानी जानों को ही तबाह नहीं करता, बल्कि यह हवा, पानी, मिट्टी और इकोसिस्टम और लंबे समय तक रहने वाले गहरे जख्म भी छोड़ जाता है. आइए जानते हैं कि इस जंग का असर पर्यावरण पर कैसे पड़ रहा है.
मिलिट्री ऑपरेशन जीवाश्म ईंधनों पर काफी ज्यादा निर्भर होते हैं. टैंक, लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज और लॉजिस्टिक्स चेन रोजाना भारी मात्रा में ईंधन जलाते हैं. सिर्फ एक लड़ाकू विमान का मिशन उतना कार्बन उत्सर्जित कर सकता है जितना हजारों गाड़ियां करती हैं. यह सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देता है.
बमों और मिसाइलों के धमाकों से सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें, साथ ही सीसा और पारा जैसी भारी धातु में हवा में फैल जाती हैं. जब इंडस्ट्रियल जोन, तेल डिपो या फिर रासायनिक संयंत्र पर हमला होता है तो यह प्रदूषण नदियों और भूजल में रिस जाते हैं.
तेल समृद्ध क्षेत्रों में तेल के कुओं पर होने वाले हमले में ऐसी आग भड़क सकती है जो महीनों तक जलती रहती है. इससे घना काला धुआं निकलता है. इससे काली बारिश भी हो सकती है. साथ ही भारी सैन्य वाहन और बारूदी सुरंगे मिट्टी की संरचना को बिगाड़ देती हैं. इससे कभी उपजाऊ रही जमीन बंजर हो जाती है.
युद्ध बमबारी और आग के जरिए जंगलों और प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर देता है. वन्य जीव या तो मर जाते हैं या फिर विस्थापित हो जाते हैं. इतना ही नहीं वे विलुप्त होने की कगार तक पहुंच जाते हैं.
संघर्ष समाप्त होने के बाद शहरों में मलबे के विशाल ढेर जमा हो जाते हैं. इस मलबे में अक्सर एस्बेस्टस, रसायन और भारी धातु जैसी खतरनाक सामग्री मौजूद होती है. इस कचरे को मैनेज करना और उसका सुरक्षित निपटान करना काफी बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बन जाता है.
भौतिक बुनियादी ढांचे के उलट पर्यावरणीय नुकसान को ठीक होने में काफी समय लगता है. प्रदूषण जल स्रोत, खराब हो चुकी मिट्टी और नष्ट हो चुके इकोसिस्टम को ठीक होने में दशकों लग सकते हैं.