Matchstick History: LPG संकट के बीच जान लीजिए 'माचिस' का इतिहास, कैसे हुआ था इसका आविष्कार?
माचिस की तीली का आविष्कार किसी सोचे समझे प्रयोग से नहीं बल्कि इत्तेफाक से हुआ था. 1826 मे ब्रिटिश केमिस्ट जॉन वॉकर ने देखा कि लकड़ी की एक तीली पर लगा केमिकल का मिश्रण जब किसी खुरदरी सतह पर रगड़ा जाता है तो उसमें आग लग जाती है. इस अचानक हुई प्रतिक्रिया से पहली फ्रिक्शन मैच बनी.
माचिस की तीलियों के शुरुआती रूप बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं थे. उनसे अक्सर अचानक चिंगारियां निकलती थी, बदबू आती थी और थोड़ी सी रगड़ से भी उनमें अचानक आग लग सकती थी.
1844 में एक बड़ी कामयाबी तक मिली जब स्वीडिश केमिस्ट गुस्ताफ एरिक पाश ने सेफ्टी मैच पेश की. माचिस की तीलियों के सिरे और उसे रगड़ने वाली सतह के बीच के केमिकल को अलग-अलग करके उन्होंने इस बात को पक्का किया कि माचिस तभी जलेगी जब उसे ठीक से रगड़ा जाएगा.
जहां यूरोप में माचिस की तीलियां पहले ही आम हो गई थीं वहीं भारत में इनका उत्पादन काफी बाद में शुरू हुआ. पहली फैक्ट्री 1921 में कोलकाता में लगाई गई थी. इससे पहले देश अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए स्वीडन और जापान जैसे देशों से होने वाले इंपोर्ट पर काफी ज्यादा निर्भर था.
माचिस की तीलियों ने इंसानों के आग जलाने के तरीके में क्रांति ला दी. इसने इसे तेज, साथ ले जाने लायक और आसानी से उपलब्ध बना दिया. चूल्हा जलाने से लेकर मोमबत्तियां जलने तक यह छोटा सा आविष्कार रोजमर्रा की जिंदगी में एक जरूरी रिश्ता बन गया.
गैस लाइटर और बिजली से जलने वाले उपकरणों जैसी नई चीजों के आने के बावजूद माचिस की तीलियां अपनी सादगी और भरोसेमंद होने की वजह से आज भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती हैं.