Global Reserve Currency: डॉलर कैसे बना ग्लोबल रिजर्व करेंसी, जानें किसी भी करेंसी को कैसे मिलता है यह दर्जा?
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका ने सहयोगी देशों को हथियार, खाना और सामान सप्लाई किया था. ज्यादातर पेमेंट सोने में किए गए थे. जिस वजह से अमेरिका युद्ध खत्म होने तक दुनिया के लगभग दो तिहाई सोने के रिजर्व जमा कर पाया था.
1944 में 44 देश के लीडर ब्रिटेन वुड्स में मिले और उन्होंने अपनी करेंसी को सीधे सोने के बजाय अमेरिकी डॉलर से जोड़ने पर अपनी सहमति दिखाई. इसके बदले में अमेरिका ने डॉलर को $35 प्रति औंस की दर से सोने में बदलने का वादा किया.
डॉलर से पहले ब्रिटिश पाउंड दुनिया की एक प्रमुख मुद्रा थी. हालांकि युद्ध के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था काफी कमजोर हो गई थी. इस वजह से पाउंड पर भरोसा कम हुआ और डॉलर स्वाभाविक रूप से नए ग्लोबल एंकर के रूप में उसकी जगह ले पाया.
1971 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को सोने में बदलने की सुविधा को खत्म कर दिया. हैरानी की बात है कि डॉलर गिरा नहीं. बल्कि यह तब भी डोमिनेंट करता रहा. क्योंकि ग्लोबल ट्रेड, तेल बाजार और फाइनेंशियल सिस्टम पहले से ही इस पर काफी ज्यादा निर्भर थे.
एक रिजर्व करेंसी एक बड़ी स्थिर अर्थव्यवस्था से आनी चाहिए जिसमें गहने फाइनेंशियल मार्केट हों. अमेरिका काफी ज्यादा लिक्विड स्टॉक और बॉन्ड मार्केट, एक मजबूत बैंकिंग सिस्टम और आसान कैपिटल मूवमेंट देता है. इस वजह से देश अपने रिजर्व को सुरक्षित रूप से स्टोर और इस्तेमाल कर सकते हैं.
यानी कि किसी भी देश की करेंसी को यह दर्जा तब मिल सकता है जब देश की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे स्थिर अर्थव्यवस्थाओं में से एक हो. साथ ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार उसी करेंसी में होना चाहिए. आपको बता दें कि 90% अंतर्राष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होता है. इतना ही नहीं बल्कि देश में एक मजबूत बैंकिंग सिस्टम और कैपिटल मार्केट होने चाहिए और सबसे जरूरी बात वह करेंसी दुनिया भर में खरीदने और बेचने के लिए आसानी से मौजूद होनी चाहिए.