Sound In Space: अंतरिक्ष में जब ट्रैवल नहीं करती आवाज, फिर एक-दूसरे की बात कैसे सुनते हैं एस्ट्रोनॉट्स?
अंतरिक्ष में आवाज ट्रैवल नहीं कर सकती क्योंकि वहां पर वाइब्रेट करने के लिए हवा नहीं है. इस परेशानी को दूर करने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों की आवाज को उनके हेलमेट के अंदर लगे माइक्रोफोन का इस्तेमाल करके रेडियो तरंगों में बदल दिया जाता है. रेडियो तरंगे वैक्यूम में आसानी से ट्रेवल कर सकती हैं.
हर अंतरिक्ष यात्री के हेलमेट के मुंह के पास बिल्ड इन माइक्रोफोन और कानों के पास स्पीकर लगे होते हैं. जब भी कोई अंतरिक्ष यात्री बोलता है तो माइक्रोफोन आवाज को पकड़ता है और उसे रेडियो सिग्नल के रूप में बदलकर भेज देता है. इसके बाद इन सिग्नल को दूसरे अंतरिक्ष यात्री के हेलमेट में स्पीकर द्वारा वापस आवाज में बदल दिया जाता है.
अंतरिक्ष यात्री अपने हेलमेट के नीचे एक खास कम्युनिकेशन हेडसेट को पहनते हैं. इसे कॉम कैप या फिर स्नूपी कैप कहते हैं. इस मुलायम कैप में ईयरफोन और माइक्रोफोन होते हैं और यह स्पेस वॉक के दौरान, स्पेसक्राफ्ट के अंदर और मिशन कंट्रोल के बाद करते समय कम्युनिकेशन को पक्का करता है.
यही रेडियो आधारित सिस्टम अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर मिशन कंट्रोल से बात करने में भी मदद करता है. उनके रेडियो सिग्नल ग्राउंड एंटीना तक पहुंचने से पहले सैटेलाइट और स्पेस स्टेशन के जरिए रिले किए जाते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि रियल टाइम बातचीत मुमकिन हो पाए.
अगर रेडियो कम्युनिकेशन फेल हो जाता है तो अंतरिक्ष यात्रियों के पास एक लो टैक इमरजेंसी ऑप्शन होता है. अपने हेलमेट को एक साथ दबाकर एक हेलमेट से वाइब्रेशन ठोस पदार्थ से दूसरे हेलमेट तक जा सकती हैं. इससे काफी बेसिक आवाज ट्रांसमिट हो पाती है.
स्पेस वॉक के दौरान अंतरिक्ष यात्री हाथ के इशारों और संकेतों पर भी निर्भर रहते हैं. अगर टेक्निकल दिक्कतों की वजह से रेडियो की क्वालिटी में रुकावट आती है तो वे हाथ के इशारों का ही इस्तेमाल करते हैं.