चांद पर चलना कितना मुश्किल, पृथ्वी पर चलने से यह कैसे अलग?

Moon Walking: चांद पर चलना काफी ज्यादा आसान लग सकता है लेकिन अंतरिक्ष यात्रियों के लिए यह धरती पर चलने से काफी अलग अनुभव होता है. चांद पर धरती की ग्रेविटी का सिर्फ छठा हिस्सा ही होता है और वहां लगभग कोई भी वायुमंडल नहीं है. इसी के साथ इसकी सतह बारीक और खुरदरी धूल से ढकी हुई है. इसमें भारी भरकम स्पेस सूट भी जोड़ लें तो संतुलन बनाए रखना या फिर कूदने के बाद रुकना भी एक चुनौती बन जाता है. आइए जानते हैं अंतरिक्ष यात्री चांद पर कैसे चलते हैं.
धरती पर 60 किलो वजन वाले अंतरिक्ष यात्री को चांद पर लगभग 10 किलो के बराबर वजन महसूस होगा. इससे चलना फिरना काफी ज्यादा हल्का लगेगा.
कम ग्रेविटी और कम पकड़ की वजह से अंतरिक्ष यात्री अक्सर धरती की तरह सामान्य कदम उठाने के बजाय उछलकर या फिर कूद कर चलते हैं.
कम ग्रेविटी शरीर के हिलने डुलने के तरीके को बदल देती है. इस वजह से शरीर की मुद्रा में थोड़ा सा बदलाव भी अंतरिक्ष यात्री के संतुलन को बिगाड़ सकता है.
चांद की सतह बारीक धूल से काफी ढकी होती है. इसके नुकीले और खुरदुरे कण चलने फिरने में मुश्किल पैदा कर सकते हैं और उपकरणों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.
चांद पर इस्तेमाल होने वाले स्पेस सूट भारी और सख्त होते हैं. भले ही चांद की ग्रेविटी में उनका वजन कम महसूस होता है इसके बावजूद भी घुटना मोड़ने, बैठने या फिर दिशा बदलने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है.
क्योंकि चांद पर लगभग कोई भी वायुमंडल नहीं है इस वजह से अंतरिक्ष यात्रियों को धरती जैसा हवा का प्रतिरोध महसूस नहीं होता. इस वजह से अचानक रुकना या फिर रफ्तार में बदलाव करना ज्यादा मुश्किल हो जाता है.
चांद की सतह को हल्का सा धक्का देने पर धरती की तुलना में काफी ऊंची और लंबी छलांग लगाई जा सकती है. इस वजह से नियंत्रित तरीके से चलना जरूरी हो जाता है.
अपोलो मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद की सतह पर स्थिरता को बनाए रखते हुए काफी कुशलता से चलने के लिए बनी हॉप और चलने के खास तरीके को विकसित किया.