Ice Without Refrigerators: 300 साल पहले नहीं थीं फ्रिज जैसी चीजें, फिर बर्फ और कुल्फी कैसे जमाते थे लोग?

Ice Without Refrigerators: आज यह काफी अजीब लग सकता है लेकिन बिजली और रेफ्रिजरेटर से सदियों पहले इंसानों ने बर्फ बनाने और उसे सुरक्षित रखने की कला में महारत हासिल कर ली थी. रेगिस्तान से लेकर ट्रॉपिकल रीजन तक लोग ठंडी ड्रिंक और आइसक्रीम जैसी चीजों का आनंद लेने के लिए प्राकृतिक मौसम की स्थिति और रसायन विज्ञान पर काफी ज्यादा निर्भर थे. आइए जानते हैं कि फ्रीजर के आने से पहले लोग बर्फ और कुल्फी कैसे जमाते थे.
प्राचीन फारस के झुलसा देने वाले रेगिस्तान में याखचल नाम के एक विशाल गुंबद के आकार की संरचना का इस्तेमाल बर्फ बनाने और स्टोर करने के लिए किया जाता था. मिट्टी, रेत, राख, अंडे की सफेदी और जानवरों के बालों से बनी मोटी इंसुलेटेड दीवारों के साथ यह संरचनाएं ज्यादा गर्मी में भी ठंडी रहती थीं. अंदर रखा पानी ठंडी रेगिस्तानी हवा और इवेपरेशन की वजह से रात भर जम जाता था.
लोगों ने पाया कि नमक या फिर पोटेशियम नाइट्रेट को बर्फ के साथ मिलाने से फ्रीजिंग प्वाइंट कम हो जाता है. इससे मिश्रण काफी ज्यादा ठंडा हो जाता है. भारत में मुगल काल के दौरान इस तकनीक का इस्तेमाल कुल्फी बनाने के लिए किया जाता था. दूध के मिश्रण को धातु के सांचों में डाला जाता था और नमकीन बर्फ से घेर दिया जाता था.
यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे ठंडी जगह पर लोग सर्दियों के दौरान जमी हुई नदियों और झीलों से बर्फ के टुकड़े काटते थे. इन बर्फ के टुकड़ों को ले जाया जाता था और पुआल, घास या फिर बुरादे से इंसुलेटेड भूमिगत बर्फ घरों में इकट्ठा किया जाता था.
बर्फ घर सावधानीपूर्वक डिजाइन किए गए भूमिगत कमरे थे जो प्राकृतिक रेफ्रिजरेटर के रूप में काम करते थे. उनकी मोटी दीवारें और इंसुलेशन गर्मी के संपर्क को कम करते थे और जल निकासी प्रणाली पिघलने वाली बर्फ को और ज्यादा पिघलने से रोकती थी.
भारत जैसी गर्म जलवायु में मिट्टी के बर्तन ठंडा करने में बड़ी भूमिका निभाते थे. जैसे ही पानी छोटे-छोटे छिद्रों से रिसता था और सतह पर इवेपरेट होता था यह बर्तन के अंदर से गर्मी को अब्जॉर्ब कर लेता था. इस तरीके का इस्तेमाल जमने की तकनीक को लागू करने से पहले दूध और मिठाइयों को ठंडा करने के लिए भी किया जाता था.
शुष्क जगह पर रात में उथली पानी की ट्रे बाहर रखी जाती थी. कम नमी और साफ आसमान की वजह से गर्मी तेजी से निकलती थी, जिससे दिन में तापमान ज्यादा होने पर भी पानी जम जाता था. यह तरीका पूरी तरह से एटमॉस्फेरिक फिजिक्स और सही टाइमिंग पर निर्भर था.