यहां है नौकरी का असली मजा, दुनिया के वो देश जहां सबसे कम हैं वर्किंग आवर्स; मौज में कटती है जिंदगी

रोजाना 9 से 10 घंटे दफ्तर में बिताने और भारी तनाव झेलने वाले कर्मचारियों के लिए वीकेंड का इंतजार किसी वरदान जैसा होता है. लेकिन दुनिया के नक्शे पर कुछ ऐसे भी चुनिंदा देश मौजूद हैं, जहां नौकरी करना कोई आफत या बोझ नहीं, बल्कि एक खुशनुमा अनुभव है. इन मुल्कों में काम को जिंदगी नहीं माना जाता, बल्कि उसे जीवन का महज एक छोटा सा हिस्सा समझा जाता है. बेहतरीन वर्क-लाइफ बैलेंस के मामले में ये देश पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन चुके हैं, जहां लोग कम काम करके भी बेहद आलीशान और सुकून भरी जिंदगी जीते हैं.
डेनमार्क बेहतरीन वर्क-लाइफ बैलेंस के मामले में पहले पायदान पर आता है. इस देश में केवल 1% लोग ही ऐसे हैं जो हफ्ते में 50 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, जबकि बाकी आबादी अपना ज्यादातर वक्त परिवार के साथ बिताती है. डेनमार्क में कर्मचारियों को सालभर में 36 दिनों की पेड छुट्टियां दी जाती हैं. यहां के कामकाजी लोगों को पूरे साल में महज 1,381 घंटे ही ऑफिस में काम करना पड़ता है.
रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्वे इस सूची में दूसरे स्थान पर है. यहां के लोग अपने पूरे दिन का करीब 65% हिस्सा यानी लगभग 15.7 घंटे सिर्फ अपनी व्यक्तिगत देखभाल, आराम और पसंदीदा शौक पूरे करने में बिताते हैं. इसी शानदार लाइफस्टाइल की वजह से नॉर्वे को दुनिया के सबसे खुशहाल देशों की कतार में गिना जाता है. इस खूबसूरत देश में कर्मचारियों के लिए साल भर में बस 1,384 घंटे काम करने का नियम बनाया गया है.
जर्मनी इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर काबिज है, जहां लोगों को साल में सिर्फ 1,386 घंटे दफ्तर का काम करना पड़ता है. जर्मनी की सरकार ने अब कानूनन एम्पलायर के लिए कर्मचारियों के काम के हर एक मिनट का सटीक डिजिटल रिकॉर्ड रखना अनिवार्य कर दिया है. यह सख्त कदम कंपनियों द्वारा बिना पैसे दिए कराए जाने वाले एक्स्ट्रा ओवरटाइम यानी अनपेड ओवरटाइम पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए उठाया गया है, ताकि किसी का शोषण न हो.
नीदरलैंड में फ्रीलांसरों और खुद का काम करने वाले लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कई बेहद कड़े और नए लेबर कानून लागू किए गए हैं. इस देश में कामकाजी लोगों को साल में केवल 1,440 घंटे ही काम करने की जरूरत होती है. नीदरलैंड के श्रम कानूनों के तहत हर कर्मचारी के लिए न्यूनतम मजदूरी तय की गई है. इसके साथ ही, बीमारी की स्थिति में भी कर्मचारियों को पूरा भुगतान यानी सिक पे पाने का कानूनी हक मिलता है.
आइसलैंड ने अपने वर्क कल्चर में क्रांतिकारी बदलाव किया है, जिसके तहत यहां के करीब 85% कर्मचारी अब हफ्ते में 5 दिन के बजाय केवल 4 दिन ही काम करते हैं. सबसे खास बात यह है कि इस कटौती के बदले उनकी सैलरी में कोई कमी नहीं की जाती है. आंकड़ों की बात करें तो आइसलैंड में लोगों को पूरे साल में केवल 1,454 घंटे काम करना होता है, जो कर्मचारियों की कार्यक्षमता और उनकी खुशहाली को काफी ज्यादा बढ़ाता है.
फ्रांस पूरे यूरोप महाद्वीप में अपने कर्मचारियों को सबसे कम वर्किंग आवर्स देने और साल में पूरे 36 दिन की पेड छुट्टियां देने के लिए जाना जाता है. फ्रांसीसी लोग हर दिन औसतन 16.2 घंटे का लंबा वक्त सिर्फ अपने मनोरंजन, आराम और पर्सनल एक्टिविटीज के लिए रिजर्व रखते हैं. फ्रांस की कंपनियों में काम करने वाले लोग पूरे साल में बस 1,505 घंटे ही काम करते हैं, जिसके कारण वहां डिप्रेशन और काम का तनाव न के बराबर है.
मजबूत अर्थव्यवस्था वाले छोटे से देश लक्जमबर्ग में सरकार 'क्वालिटी ओवर क्वांटिटी' के सिद्धांत पर काम करती है. इसका मतलब है कि यहां दफ्तरों में काम के घंटों की गिनती करने के बजाय काम की गुणवत्ता और आउटपुट पर सबसे ज्यादा फोकस किया जाता है. लक्जमबर्ग के नियमों के अनुसार कर्मचारियों को पूरे साल में केवल 1,506 घंटे ही काम करने की आवश्यकता पड़ती है, जिससे कर्मचारी अपनी नौकरी और निजी जीवन दोनों में पूरी तरह संतुष्ट रहते हैं.