क्या इंसान की आंख का रंग बदल सकता है, जानें इसके पीछे का विज्ञान?

Eye Colour: क्या समय के साथ इंसानी आंखों का रंग सच में बदल सकता है या फिर सिर्फ कुछ खास हालात में ही अलग दिखता है? आंखों का रंग मुख्य रूप से जेनेटिक्स और आइरिस में मौजूद मेलानिन की मात्रा से तय होता है. हालांकि किसी व्यक्ति की आंखों का मूल रंग आमतौर पर व्यस्क होने पर एक ही रहता है, लेकिन उम्र, रोशनी पुतली के आकार या फिर आसपास के रंगों की वजह से यह बदलता हुआ लग सकता है. आइए जानते हैं इस बारे में पूरी जानकारी.
आंखों का रंग मुख्य रूप से उन जीन्स से कंट्रोल होता है जो आइरिस में मेलानिन की मात्रा और उसके फैलाव को तय करते हैं.
कुछ बच्चे नीली या फिर ग्रे आंखों के साथ पैदा होते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी आइरिस में शुरू में काफी कम मेलानिन होता है. जैसे-जैसे यह बढ़ता है उनकी आंखें भूरी, हरी या फिर हेजल हो सकती है.
लगभग 10% से 15% लोगों में उम्र बढ़ने के साथ आंखों के रंग में मामूली बदलाव हो सकते हैं. पिगमेंटेशन कम होने से कभी-कभी गहरी आंखें थोड़ी हल्की दिख सकती है.
तेज रोशनी पुतली को छोटा कर देती है, जबकि अंधेरा और तेज भावनाएं इसे बड़ा कर सकती हैं. इससे आइरिस का कितना हिस्सा दिखाई देता है यह बदल जाता है और इसका रंग अलग दिख सकता है.
नीली, ग्रे और हेजल आंखें अलग-अलग रोशनी की स्थिति में अलग-अलग दिख सकती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि रोशनी आइरिस और आस-पास के माहौल के साथ कैसे प्रतिक्रिया करती है, यह मायने रखता है.
किसी व्यक्ति के आस-पास के कपड़ों, दीवारों या फिर चीजों के रंग आंखों की ओर रोशनी को रिफ्लेक्ट कर सकते हैं. इससे उनका प्राकृतिक रंग ज्यादा चमकीला, गहरा या थोड़ा अलग दिख सकता है.
आंख में गंभीर चोट आइरिस को नुकसान पहुंचा सकती है, इसी के साथ ग्लूकोमा की कुछ दवाएं आंखों के पिगमेंटेशन को हमेशा के लिए बदल सकती हैं.
किसी वयस्क की आंखों के रंग में अचानक और साफ तौर पर दिखने वाला बदलाव कभी-कभी मोतियाबिंद या फिर हॉर्नर सिंड्रोम जैसी स्थिति से जुड़े हो सकते हैं.