Foreign Currency Adoption: क्या कोई देश किसी दूसरे मुल्क की करेंसी अपना सकता है, जानें किस स्थिति में लिया जा सकता है यह फैसला
विदेशी करेंसी को अपनाने की सबसे आम वजह है बेकाबू महंगाई. जब कीमतें रोज बढ़ती हैं और लोग राष्ट्रीय करेंसी पर से भरोसा खो देते हैं तो पैसा बचत या फिर व्यापार के लिए लगभग बेकार ही हो जाता है. ऐसी स्थिति में अमेरिकी डॉलर जैसी करेंसी अपनाने से खरीदने की शक्ति और कीमतों में स्थिरता लाने में काफी मदद मिलती है.
छोटी या फिर संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्थाएं अक्सर विदेशी करेंसी को अपनाती हैं. विश्व स्तर पर भरोसेमंद करेंसी का इस्तेमाल करने से निवेशकों को इस बात का भरोसा होता है कि महंगाई कंट्रोल में रहेगी.
जब भी विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो जाता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मुश्किल हो जाता है तो करेंसी दबाव में ढह सकती है. दूसरे देश की करेंसी अपनाने से आयात बनाए रखना, बाहरी कर्ज चुकाने और कुल आर्थिक पतन को रोकने में मदद मिलती है.
जो देश व्यापारिक भागीदारी पर काफी ज्यादा निर्भर होते हैं वह कभी-कभी व्यापार को आसान बनाने और विनिमय दर के जोखिमों को कम करने के लिए उसे भागीदारी की करेंसी को अपना लेते हैं.
हालांकि स्थिरता में सुधार होता है लेकिन जो देश विदेशी करेंसी को अपनाते हैं वह मौद्रिक नीति पर अपना कंट्रोल खो देते हैं. वह अब मंदी के दौरान पैसे नहीं छाप सकता, ब्याज दरें एडजस्ट नहीं कर सकता या फिर अपनी करेंसी का अवमूल्यन नहीं कर सकता.
दूसरे देशों की करेंसी को तभी चुना जाता है जब बाकी सभी सुधार फेल हो जाते हैं. आमतौर पर ऐसे कदम उठाने से पहले सरकारें इस फायदे नुकसान पर ध्यान से विचार करती हैं कि कम समय की स्थिरता चाहिए या फिर लंबे समय का पॉलिसी कंट्रोल का नुकसान.