सिख धर्म में शादी से पहले क्यों नहीं देखते कुंडली, रोचक है वजह

सिख धर्म कुंडली
धर्मशास्त्रों में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है इसलिए विवाह से पहले शुभ मुहूर्त और ग्रह-नक्षत्रों की अनुकूलता देखने की परंपरा बनी. इसका उद्देश्य दांपत्य जीवन को अधिक सुखद और संतुलित बनाना माना जाता है. लेकिन सिख धर्म अलग परंपरा को फॉलो करता है.
हिंदू धर्म में विवाह के लिए लोग अनेकों जगह कुंडली दिखाते हैं उसके बाद गुण मिलने पर ही रिश्ता आगे बढ़ाने पर जोर देते हैं. सिख परंपरा मानती है कि निस्वार्थ भाव से की गई सेवा केवल दूसरों का ही नहीं, बल्कि स्वयं का भी कल्याण करती है.
सिख धर्म ये मानता है कि जीवन में सफलता और सम्मान पाने के लिए अच्छे कार्यों और ईमानदार आचरण को सबसे जरुरी है. जरूरतमंदों की सहायता और समाज के लिए किए गए कार्य व्यक्ति के भीतर सकारात्मकता का संचार करते हैं.
सिख मत में ग्रह-नक्षत्रों या कुंडली से अधिक महत्व ईश्वर की कृपा और सच्ची श्रद्धा को दिया गया है। माना जाता है कि जो व्यक्ति नाम सिमरन और भक्ति में लगा रहता है, उसके जीवन में कभी परेशानियां नहीं आती और अगर संकट आए भी तो उससे निपटने की शक्ति मिलती है.
ज्योतिष में छठा भाव जीवन की चुनौतियों, ऋण, रोग और शत्रुओं का प्रतिनिधित्व करता है. साथ ही इसे व्यक्ति के भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और ईर्ष्या जैसे आंतरिक विकारों से भी जोड़ा जाता है. सुखी वैवाहिक जीवन के लिए स्थिरता और इन विकारों से दूर रहना अति आवश्यक ह.
माना जाता है कि जब ये प्रवृत्तियां अधिक प्रभावी हो जाती हैं, तो व्यक्ति को मानसिक अशांति, संघर्ष और विभिन्न प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है.इसी कारण सेवा को छठे भाव से जुड़े नकारात्मक प्रभावों को संतुलित करने का महत्वपूर्ण उपाय माना गया है.