Mahabharat: वनवास से पहले कुंती को पांडवों की भावुक विदाई

महाभारत कथा
युधिष्ठिर जब वन जाने लगे तो सबसे पहले अपनी माता कुंती को समझाया कि हर परिस्थिति में धर्म का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि क्रोध और द्वेष इंसान को कमजोर बनाते हैं, जबकि सत्य और धैर्य उसे मजबूत करते हैं. उन्होंने माता से विदुर के संरक्षण में रहने का आग्रह किया और जल्द लौटने का वचन भी दिया.
मां कुंती ने अपने पुत्रों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि कठिन समय में भी अपने संस्कार और कर्तव्य को कभी मत भूलना. उन्होंने सभी बेटों को प्रेम, एकता और धैर्य के साथ आगे बढ़ने की सीख दी. एक मां होने के नाते उनका मन दुखी था, लेकिन उन्हें अपने पुत्रों के धर्म पर पूरा विश्वास था.
विदा का वह पल बेहद भावुक था. द्रौपदी ने मां कुंती के चरणों में सिर झुकाया तो कुंती ने उसे गले लगाकर ढांढस बंधाया. उन्होंने कहा कि मुश्किलें हमेशा नहीं रहतीं, इसलिए धैर्य बनाए रखना. उस समय हर किसी की आंखें नम थीं, लेकिन सभी के मन में उम्मीद भी थी.
वन की ओर बढ़ने से पहले पांडवों ने विदुर, धृतराष्ट्र और सभी बड़ों का सम्मानपूर्वक आशीर्वाद लिया. युधिष्ठिर जानते थे कि यह रास्ता आसान नहीं होगा, फिर भी उन्होंने धर्म का मार्ग चुना. उन्होंने अपने दुख को मन में रखा और कर्तव्य को सबसे ऊपर माना.
पुत्रों के जाने के बाद कुंती का हृदय दुख से भर गया, लेकिन उन्होंने आंसुओं से ज्यादा विश्वास को महत्व दिया. उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि उनके पुत्र हर संकट से सुरक्षित निकलें और सत्य की राह पर अडिग रहें. एक मां का आशीर्वाद ही उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बन गया.
जीवन में हर किसी को कभी न कभी कठिन दौर से गुजरना पड़ता है. ऐसे समय में घबराने के बजाय धैर्य, सत्य और अपने कर्तव्य पर भरोसा रखना चाहिए. माता पिता का आशीर्वाद, बड़ों का सम्मान और सही रास्ते पर चलने का साहस अंत में इंसान को उसकी मंजिल तक जरूर पहुंचाता है.