Mahabharat: युधिष्ठिर से दुर्योधन तक, जानिए महाभारत के सभी राजकुमारों की जन्म कथा

महाभारत कथा
वन में शिकार करते समय राजा पांडु ने अनजाने में एक ऋषि और उनकी पत्नी पर बाण चला दिया, जो हिरण के रूप में थे. मृत्यु से पहले ऋषि ने क्रोधित होकर पांडु को श्राप दिया कि यदि वे कभी अपनी पत्नियों के पास जाएंगे, तो उसी क्षण उनकी मृत्यु हो जाएगी. इसी श्राप के कारण पांडु वनवास में रहने लगे थे.
राजा पांडु को एक श्राप मिलने के बाद उन्होंने राजपाट छोड़ दिया और अपनी पत्नियों कुंती तथा माद्री के साथ वन में रहने लगे. हिमालय के शांत जंगलों में उन्होंने साधु-संतों की तरह जीवन बिताना शुरू किया. राजसी सुख छोड़कर तपस्या और सादगी अपनाने वाला यह जीवन आगे चलकर पांडवों के जन्म का कारण बना.
वन में रहते समय कई महान ऋषि-मुनि पांडु और कुंती को आशीर्वाद देने पहुंचे. कुंती के पास एक दिव्य मंत्र था, जिसके द्वारा वह देवताओं का आह्वान कर सकती थीं. ऋषियों ने कहा कि धर्म और सत्य की रक्षा के लिए दिव्य शक्तियों से जन्म लेने वाले पुत्र इस धरती पर अवश्य आएंगे. इसके बाद पांडवों के जन्म की शुरुआत हुई.
कुंती ने सबसे पहले धर्मराज का आह्वान किया. उनके आशीर्वाद से एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया. बचपन से ही वह सत्य, न्याय और धर्म का पालन करने वाले थे. पूरे वन में उनके जन्म की खुशी मनाई गई. सभी ऋषियों ने भविष्यवाणी की कि यह बालक महान राजा बनेगा.
इसके बाद कुंती ने वायु देव का स्मरण किया. उनकी कृपा से भीम का जन्म हुआ. जन्म लेते ही भीम असाधारण बल के प्रतीक दिखाई दिए. कहा जाता है कि बचपन में ही उनकी शक्ति इतनी अधिक थी कि साधारण बालक उनके सामने टिक नहीं सकते थे. पांडु और कुंती ने समझ लिया कि यह पुत्र भविष्य में महान योद्धा बनेगा.
राजा पांडु की इच्छा पर कुंती ने देवराज इंद्र का आह्वान किया. इंद्र के आशीर्वाद से अर्जुन का जन्म हुआ. अर्जुन बचपन से ही तेजस्वी, एकाग्र और पराक्रमी थे. ऋषियों ने कहा कि यह बालक संसार का सबसे महान धनुर्धर बनेगा. आगे चलकर अर्जुन ने अपने कौशल और वीरता से पूरे आर्यावर्त में प्रसिद्धि प्राप्त की.
माद्री ने अश्विनी कुमारों का आह्वान किया, जिनके आशीर्वाद से जुड़वां पुत्र नकुल और सहदेव का जन्म हुआ. नकुल अत्यंत सुंदर और वीर थे, जबकि सहदेव बुद्धिमान और शांत स्वभाव के थे. दोनों भाइयों के जन्म से वन में खुशियों का माहौल बन गया. पांचों पांडव अब एक दिव्य और शक्तिशाली परिवार का रूप ले चुके थे.
हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी भी संतान प्राप्ति के लिए तपस्या कर रही थीं. लंबे समय तक गर्भ रहने के बाद उन्होंने एक मांसपिंड को जन्म दिया. महर्षि व्यास ने उसे सौ भागों में विभाजित कर घड़ों में सुरक्षित रखने का आदेश दिया. समय आने पर उन्हीं घड़ों से कौरवों का जन्म हुआ.
सबसे पहले दुर्योधन का जन्म हुआ. उसके जन्म के समय कई अशुभ संकेत दिखाई दिए, जिन्हें देखकर विद्वानों ने चिंता जताई. धीरे-धीरे गांधारी के सौ पुत्र और एक पुत्री जन्मे. दुर्योधन अपने भाइयों में सबसे अधिक महत्वाकांक्षी और अहंकारी था. आगे चलकर उसी के कारण पांडवों और कौरवों के बीच बड़ा संघर्ष शुरू हुआ.
समय बीतने के साथ पांडव और कौरव साथ बड़े होने लगे. उन्होंने एक ही गुरु से शिक्षा प्राप्त की और युद्ध कला सीखी. शुरुआत में सभी भाई एक परिवार की तरह दिखाई देते थे, लेकिन धीरे-धीरे ईर्ष्या और सत्ता की इच्छा बढ़ने लगी. यही मतभेद आगे चलकर महाभारत के सबसे बड़े युद्ध का कारण बने.