Mahabharat: जब पूरी सभा मौन रही और द्रौपदी ने पूछा धर्म कहाँ है?

महाभारत कथा
हस्तिनापुर की राजसभा में जुए का खेल चल रहा था. शकुनि की चालों में फँसकर युधिष्ठिर एक-एक करके अपना धन, राज्य और वैभव हारते चले गए. सभा में बैठे सभी योद्धा यह सब देखते रहे, लेकिन किसी ने भी इस अन्याय को रोकने का साहस नहीं किया. यहीं से महाभारत के सबसे दुखद प्रसंग की शुरुआत हुई.
सारी संपत्ति हारने के बाद भी युधिष्ठिर नहीं रुके. शकुनि ने उन्हें अपने भाइयों को दांव पर लगाने के लिए उकसाया. पहले नकुल, फिर सहदेव, उसके बाद अर्जुन और भीम भी हार गए. अंत में स्वयं युधिष्ठिर ने भी अपने आपको दांव पर लगाकर हार स्वीकार कर ली.
जब युधिष्ठिर स्वयं को भी हार चुके, तब शकुनि ने द्रौपदी को दांव पर लगाने का सुझाव दिया. द्रौपदी का नाम सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया. प्रश्न यह था कि जो व्यक्ति स्वयं को हार चुका हो, क्या उसे अपनी पत्नी को दांव पर लगाने का अधिकार है?
द्रौपदी ने राजसभा में अपना पहला प्रश्न भेजा राजा पहले स्वयं हारे थे या मुझे दांव पर लगाया? इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं था. भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और विदुर जैसे विद्वान भी धर्मसंकट में पड़ गए और सभा मौन बनी रही.
दुर्योधन ने द्रौपदी को सभा में लाने का आदेश दिया. विदुर ने इसका विरोध किया, लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई. दुःशासन क्रोध में द्रौपदी को बाल पकड़कर सभा में घसीट लाया. उस समय द्रौपदी ने सभा में उपस्थित सभी महान योद्धाओं से न्याय की गुहार लगाई.
द्रौपदी ने भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र सहित सभी से पूछा कि धर्म क्या कहता है. किसी ने साफ उत्तर नहीं दिया. दुर्योधन और कर्ण ने उसका अपमान किया, जबकि सभा में बैठे अधिकांश लोग मौन रहे. यह मौन अन्याय को और अधिक बल देता गया.
जब दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब द्रौपदी ने पूरी श्रद्धा से श्रीकृष्ण का स्मरण किया. भगवान की कृपा से उनका चीर अनंत होता गया और दुःशासन थककर चूर हो गया. अंततः द्रौपदी की लाज बच गई और अधर्म पर ईश्वर की शक्ति प्रकट हुई.
इस प्रसंग का संदेश साफ है अन्याय करना जितना बड़ा पाप है, उतना ही बड़ा पाप अन्याय देखकर मौन रहना भी है. धर्म हमेशा सत्य, सम्मान और न्याय के साथ खड़ा होता है. कठिन समय में ईश्वर पर विश्वास और सही के पक्ष में आवाज़ उठाना ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है.