Mahabharat: भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा: पिता के प्रेम में देवव्रत ने क्यों छोड़ा सिंहासन और लिया आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत?

भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा
एक बार राजा शांतनु यमुना नदी के समीप वन में गए. वहां उन्होंने मल्लाह की एक देवकन्या को देखा. उसका रूप अत्यंत सुंदर और आकर्षक था. राजा उसे देखते ही मोहित हो गए और उसके पास जाकर बोले कि तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? क्या तुम मेरी रानी बनोगी? उस कन्या का नाम सत्यवती था.
राजा शांतनु सत्यवती के पिता के पास पहुंचे और विवाह का प्रस्ताव रखा. मल्लाह ने सम्मानपूर्वक कहा कि उसे विवाह से कोई आपत्ति नहीं, लेकिन उसकी एक शर्त है. सत्यवती से जन्म लेने वाला पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बने. यह सुनकर राजा शांतनु धर्म और पुत्र प्रेम के कारण गहरे चिंतन में पड़ गए.
राजा शांतनु कई दिनों तक उदास रहने लगे. वे राजकाज में भी मन नहीं लगा पा रहे थे. देवव्रत ने जब अपने पिता को चिंतित देखा, तो उन्होंने कारण जानने का प्रयास किया. सारथी और मंत्रियों से पूछने पर उन्हें सत्यवती और उसके पिता की शर्त के बारे में पता चला. तब देवव्रत ने पिता का दुख दूर करने का निश्चय किया.
देवव्रत स्वयं मल्लाह के पास पहुंचे और कहा कि वे हस्तिनापुर के राजसिंहासन का अधिकार छोड़ते हैं. उन्होंने वचन दिया कि सत्यवती का पुत्र ही भविष्य में राजा बनेगा. यह सुनकर मल्लाह प्रसन्न तो हुआ, लेकिन उसे भय था कि भविष्य में देवव्रत की संतान राज्य पर अधिकार मांग सकती है.
मल्लाह की शंका दूर करने के लिए देवव्रत ने सबके सामने भयंकर प्रतिज्ञा ली. उन्होंने कहा कि वे जीवनभर विवाह नहीं करेंगे और आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे. उनकी यह प्रतिज्ञा इतनी कठोर थी कि वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए. देवताओं ने भी उनकी इस त्याग भावना की प्रशंसा की.
देवव्रत की महान प्रतिज्ञा सुनकर आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी. देवताओं ने कहा कि इतनी भीषण प्रतिज्ञा लेने वाला पुरुष संसार में दुर्लभ है. तभी से देवव्रत “भीष्म” कहलाए. राजा शांतनु ने प्रसन्न होकर उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान दिया. इस प्रकार भीष्म पितामह त्याग, धर्म और वचनपालन के प्रतीक बन गए.