Mahabharat: जब पूरे नगर पर छाया था मौत का साया, तब अकेले भीम ने किया बकासुर का अंत

महाभारत कथा
लाक्षागृह की भयावह घटना से बचने के बाद पांडव अपनी माता कुंती के साथ एकचक्रा नगरी पहुंचे. अपनी पहचान छिपाने के लिए उन्होंने साधारण ब्राह्मणों का वेश धारण कर लिया. एक दयालु ब्राह्मण ने उन्हें अपने घर में आश्रय दिया, जहां वे शांतिपूर्वक रहने लगे और नए जीवन की शुरुआत की.
एकचक्रा में पांडव प्रतिदिन भिक्षा मांगकर अपना जीवनयापन करते थे. जो अन्न मिलता, उसे कुंती सभी भाइयों में बांट देती थीं. भीम को अधिक भोजन दिया जाता क्योंकि उनकी शक्ति असाधारण थी. कठिन परिस्थितियों के बावजूद पांडव धैर्य और संयम के साथ अपने दिन व्यतीत कर रहे थे.
एक दिन पांडवों ने अपने आश्रयदाता ब्राह्मण के घर से रोने और विलाप की आवाजें सुनीं. पूरा परिवार गहरे दुख में डूबा हुआ था. कुंती ने कारण पूछा तो पता चला कि नगर में बकासुर नामक भयानक राक्षस का आतंक फैला हुआ है और अब उस परिवार की बारी आ चुकी थी.
बकासुर नगरवासियों से भोजन से भरी गाड़ी और उसके साथ एक मनुष्य की बलि मांगता था. जो भी उसके पास जाता, वह उसे खा जाता था. नगर के लोगों ने भय के कारण यह व्यवस्था स्वीकार कर ली थी. अब ब्राह्मण परिवार अपने किसी सदस्य को भेजने की कठिन स्थिति में था.
ब्राह्मण परिवार की पीड़ा देखकर कुंती ने सहायता करने का निश्चय किया. उन्होंने कहा कि उनके पुत्र भीम बकासुर के पास जाएंगे. भीम अत्यंत बलशाली थे और किसी भी संकट का सामना करने में सक्षम थे. कुंती को विश्वास था कि उनका पुत्र राक्षस के आतंक का अंत कर सकता है.
भीम ने न केवल ब्राह्मण परिवार की रक्षा की, बल्कि पूरे नगर को भय से मुक्त कराया. यह कथा सिखाती है कि सच्चा वीर वही है जो अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की सहायता के लिए करे. साहस, करुणा और निस्वार्थ सेवा अंततः अधर्म और अन्याय पर विजय दिलाती हैं.