Holi 2026: मुर्दे की सवारी, कोड़ामार, पत्थरबाजी...भारत में इन 6 जगहों पर खेलते हैं अनोखी होली

होली अनोखी परंपरा
पंजाब से सटे श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में कोड़ामार होली की परंपरा है. होली मनाने के इस खास अंदाज में यहां देवर-भाभी के बीच कोड़े वाली होली काफी चर्चित है. होली पर देवर-भाभी को रंगने का प्रयास करते हैं और भाभी-देवर की पीठ पर कोड़े मारती है. इस मौके पर देवर-भाभी से नेग भी मांगते हैं.
राजस्थान के भीलवाड़ा में जिंदा व्यक्ति को मुर्दा बनाकर उसकी शव यात्रा निकालते हैं और होली मनाई जाती है. किसी युवक को अर्थी पर लेटाया जाता है और फिर गाजे-बाजे के साथ रंग-गुलाल उडाते हुए पूरे शहर में उसकी शव यात्रा निकाली जाती है. प्रतिक के तौर पर अर्थी संस्कार भी किया जाता है लेकिन उससे पहले अर्थी पर लेटा युवक भाग जाता है. ये परंपरा अपने अंदर छिपी बुराइयों और भड़ास को बाहर निकलने है और फिर नई शुरुआत करने के तौर पर निभाई जाती है.
मध्यप्रदेश के झाबुआ, उन्हेल और आसपास के गांव में होलिक दहन के बाद अंगारों पर चलने की परंपरा निभाई जाती है. राजस्थान के डूंगरपुर में भी दहकते आंगारों पर चलकर ये अनूठी परंपरा निभाते हैं. मान्यता है इससे विपदा नहीं आती.
आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के संथेकुडलूर गाँव में होली पर पुरुष के साड़ी और गहने पहने की अनोखी परंपरा है. यह रस्म रति-कामदेव की पूजा के तहत की जाती है, जिसमें पुरुष भगवान को प्रसन्न करने के लिए महिलाओं के कपड़े धारण करते हैं.
भारत में होली पर अलग-अलग शहरों में अजब-गजब परंपराएं निभाई जाती है. इन्हीं में से एक है पत्थर मार होली. राजस्थान के बांसवाड़ा और डूंगरपुर में आदिवासी बहुल क्षेत्र में एक-दूसरे पर पत्थर फेंककर होली खेलते हैं. कहते हैं इस पत्थर मार होली अगर किसी को चोट लगती है, तो इसे अच्छा संकेत माना जाता है.
हिमाचल प्रदेश के मंडी में होली पर मिठाई के अलावा बहन और बेटी के घर स्पेशल तरह की रोटियां भेजी जाती है. इन रोटियों में केसर, पिस्ता, अखरोट का भी इस्तेमाल किया जाता है. इस परम्परा के पीछे मान्यता यह है कि जमीन में उगी फसल का भाग बेटियों को भेजने से मायके और ससुराल दोनों में सुख-समृद्धि बनी रहती है.
प्रयागराज होलिका दहन से एक दिन पहले शहर की सड़कों पर हथौड़े की बारात निकाली जाती है. इस हथौड़े को दूल्हे के रूप में पूजा जाती है फिर इससे कद्दू को तोड़ा जाता है. इससे कद्दू भंजन कहते हैं. ये परंपरा को बुराई और नकारात्मकता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.