गन्ने से कैसे तैयार किया जाता है एथेनॉल, क्या इसे खेत में भी कर सकते हैं प्रोसेस?

पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच आजकल एथेनॉल का नाम हर तरफ गूंज रहा है. यह एक तरह का बायोफ्यूल है जिसे गन्ने के रस से तैयार किया जाता है. जब सरकार पेट्रोल में इसे मिक्स करने की बात करती है, तो इसका सीधा फायदा हमारे देश के गन्ना किसानों को मिलता है. क्योंकि इससे उनकी आमदनी बढ़ने का एक नया रास्ता खुल जाता है.
गन्ने से एथेनॉल बनाने का प्रोसेस काफी दिलचस्प है और यह चीनी मिलों या डिस्टिलरी में बड़े पैमाने पर होता है. सबसे पहले खेतों से गन्ना काटकर मिलों में लाया जाता है, जहां मशीनों के जरिए इसका रस निकाला जाता है. इस गन्ने के रस को भारी मात्रा में इकट्ठा करके बड़े-बड़े कंटेनर्स या टैंक्स में स्टोर किया जाता है जिससे आगे का प्रोसेस शुरू हो सके.
रस निकालने के बाद सबसे मुख्य स्टेप होता है फर्मेंटेशन. जिसे हिंदी में किण्वन भी कहते हैं. इस प्रोसेस में गन्ने के रस में खास तरह का यीस्ट या बैक्टीरिया मिलाया जाता है. यह यीस्ट रस में मौजूद नेचुरल शुगर को धीरे-धीरे अल्कोहल में बदलना शुरू कर देता है. इस पूरे केमिकल रिएक्शन में कुछ समय लगता है जिससे एक कच्चा अल्कोहल लिक्विड तैयार होता है.
फर्मेंटेशन पूरा होने के बाद जो लिक्विड मिलता है. उसमें पानी की मात्रा काफी ज्यादा होती है. इस पानी को अलग करने के लिए डिस्टिलेशन का प्रोसेस अपनाया जाता है. इस मिक्सचर को एक निश्चित तापमान पर उबाला जाता है, जिससे अल्कोहल भाप बनकर ऊपर उड़ता है और उसे कंडेंस करके यानी ठंडा करके अलग कर लिया जाता है.
डिस्टिलेशन के बाद भी इसमें थोड़ी नमी बची रहती है जिसे पूरी तरह सुखाकर एकदम शुद्ध यानी एब्सोल्यूट अल्कोहल बनाया जाता है. जब इसमें से पानी का आखिरी कतरा भी निकल जाता है. तब जाकर यह फ्यूल ग्रेड एथेनॉल बनता है. यही वह फाइनल प्रोडक्ट है जो गाड़ियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने के लिए पूरी तरह से फिट और तैयार माना जाता है.
अब बात करते हैं सबसे बड़े सवाल की कि क्या इस पूरे प्रोसेस को सीधे अपने खेत में किया जा सकता है. तो इसका सीधा जवाब है नहीं इसे खेत में प्रोसेस करना मुमकिन नहीं है. एथेनॉल बनाने के लिए बहुत ही एडवांस मशीनों, बॉयलर, डिस्टिलेशन कॉलम और भारी बिजली सप्लाई की जरूरत होती है. जो सिर्फ एक प्रॉपर फैक्ट्री या मिल में ही सेटअप हो सकती है.
खेत में प्रोसेस न हो पाने की एक और बड़ी वजह इसके कड़े सरकारी नियम और सुरक्षा से जुड़े मानक हैं. अल्कोहल का प्रोडक्शन होने के कारण इसके लिए एक्साइज ड्यूटी और पर्यावरण विभाग से कई तरह के लाइसेंस लेने पड़ते हैं. तो साथ ही इसमें आग लगने का खतरा बहुत ज्यादा होता है. इसलिए इसे सिर्फ सर्टिफाइड प्लांट्स में ही बेहद सावधानी से बनाया जाता है.