मौजूदा वक्त में दुनिया के कई हिस्सों में  किसी सरकार या व्यवस्था के खिलाफ लोग अपनी आवाज अलग-अलग तरह से उठाते हैं. इसके लिए सड़कें आंदोलन का बड़ा मंच बन जाती है. लोग मार्च निकालते हैं, धरना देते हैं, काम बंद करते हैं और अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाते हैं. भारत से लेकर यूरोप और एशिया के कई देशों तक इस समय अलग-अलग मुद्दों को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं.

Continues below advertisement

इतिहास में दर्ज सबसे पुरानी मजदूर हड़ताल का उदाहरण करीब 3,000 साल पुराना है. यह घटना प्राचीन मिस्र के डीर अल-मदीना गांव में हुई थी. करीब 1157 ईसा पूर्व राजा रामेसेस तृतीय के शासनकाल में शाही कब्रों पर काम करने वाले कारीगरों और मजदूरों ने काम बंद कर दिया था. उन्हें मजदूरी के तौर पर अनाज और दूसरी जरूरी चीजें मिलती थीं, जब राशन मिलने में देरी हुई तो मजदूरों ने काम रोक दिया और अधिकारियों के सामने अपनी मांग रखी.

मजदूरों ने काम छोड़ा और अधिकारियों तक पहुंचे

Continues below advertisement

डीर अल-मदीना के मजदूर सामान्य मजदूर नहीं थे. वे मिस्र के शाही परिवार के लिए कब्रों का निर्माण और सजावट करने वाले कुशल कारीगर थे. जब उन्हें समय पर राशन नहीं मिला तो उन्होंने काम बंद कर दिया. रिकॉर्ड के मुताबिक मजदूर अपनी शिकायत लेकर अधिकारियों तक पहुंचे और बाद में सामूहिक रूप से विरोध किया. यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि यह बताती है कि हजारों साल पहले भी आम लोग अपनी आर्थिक मांगों के लिए सामूहिक दबाव बनाने का तरीका इस्तेमाल करते थे. इसे इतिहास की सबसे पुरानी दर्ज मजदूर हड़ताल माना जाता है.

आज भी सड़कें बन रही हैं विरोध का बड़ा मंच

आज के दौर में आंदोलन का तरीका काफी बदल गया है, लेकिन मूल विचार वही है. लोग किसी फैसले, कानून, आर्थिक समस्या, नौकरी, शिक्षा, आवास या राजनीतिक मुद्दे के खिलाफ एकजुट होकर अपनी आवाज उठाते हैं. भारत में इस समय चुनाव आयोग और SIR को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक समूहों के प्रदर्शन जारी हैं. 6 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के विपक्षी सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग के दफ्तर तक मार्च का आयोजन किया. प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR को वापस लेने की मांग की. ये मांगें राजनीतिक दलों के आरोपों पर आधारित हैं, जबकि चुनाव आयोग ने SIR को लेकर लगाए गए आरोपों को खारिज किया है. मुंबई में भी SIR और चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं. 4 अक्टूबर को उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने संयुक्त मार्च निकाला और CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की.

फ्रांस में छात्र सड़कों पर

फ्रांस में हाई स्कूल के छात्रों का आंदोलन भी चर्चा में है. सितंबर में शुरू हुआ यह आंदोलन अब कई शहरों तक फैल चुका है. छात्र स्कूलों में कम निवेश, खराब इमारतों, ज्यादा भीड़ और शिक्षकों से जुड़ी समस्याओं को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. रिपोर्टों के मुताबिक आंदोलन कई शहरों में तेजी से फैला है और कुछ जगहों पर स्कूलों के बाहर बैरिकेड भी लगाए गए. फ्रांस में यह प्रदर्शन आने वाले समय में और बड़ा होने की संभावना के बीच चर्चा में है.

स्पेन में घर के संकट को लेकर बड़ा प्रदर्शन

स्पेन में महंगे घर और किराए का मुद्दा लोगों को सड़कों पर ले आया है. 3 अक्टूबर को देश के करीब 50 शहरों में प्रदर्शन हुए. मैड्रिड में करीब 70 हजार लोगों के प्रदर्शन में शामिल होने की रिपोर्ट है. 87 साल की मारिकर्मेन अबास्कल को घर से निकाले जाने का मामला इस आंदोलन का बड़ा प्रतीक बन गया. प्रदर्शनकारी सरकार से घरों की कीमत और किराए को कम करने तथा लोगों को बेदखली से बचाने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग कर रहे हैं.

पाकिस्तान में इमरान खान की रिहाई के लिए लॉन्ग मार्च

पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी PTI के समर्थकों ने इस महीने इस्लामाबाद की ओर लॉन्ग मार्च शुरू किया है. मार्च खैबर पख्तूनख्वा से शुरू हुआ और इसका मकसद जेल में बंद इमरान खान की रिहाई की मांग करना है. सरकार और PTI के बीच बातचीत विफल होने के बाद यह मार्च शुरू हुआ. पाकिस्तान सरकार ने इस्लामाबाद में सुरक्षा बढ़ा दी है और प्रदर्शनकारियों को राजधानी में प्रवेश से रोकने की बात कही है.