अंतरिक्ष में करीब 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर एक ऐसी जगह है, जहां पिछले 25 सालों से इंसान लगातार रह रहे हैं. ये है इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS). करीब 450 टन वजनी ये स्टेशन, एक फुटबॉल मैदान के बराबर बड़ा है. 1998 में इसकी शुरुआत हुई और 2000 से लेकर अब तक लगातार यहां अंतरिक्ष यात्री रह रहे हैं, लेकिन अब इसकी उम्र पूरी हो रही है. 2030 में इसे रिटायर्ड कर दिया जाएगा. नासा ने इसके लिए 1 अरब डॉलर (करीब 9500 करोड़ रुपए) का प्लान तैयार किया है और 2028 से 2030 के बीच इसे वापस धरती पर उतारकर प्रशांत महासागर में गिराने की योजना है. आखिर इस अंतरिक्ष के घर को क्यों खत्म किया जा रहा है, इसके बाद अंतरिक्ष में क्या होगा और इससे दुनिया पर भारत पर क्या असर पड़ेगा?
क्या है इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन?
ISS दुनिया की पांच सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियों का एक साझा प्रोजेक्ट है. इसमें NASA (अमेरिका), Roscosmos (रूस), JAXA (जापान), ESA (यूरोप) और CSA (कनाडा) शामिल हैं. 1998 में इसका पहला हिस्सा अंतरिक्ष में भेजा गया था और साल 2000 से लेकर अब तक यहां लगातार अंतरिक्ष यात्री रह रहे हैं.
यह तकरीबन 450,000 किलोग्राम वजनी, एक फुटबॉल मैदान के आकार का स्पेस लैब है, जो करीब 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर परिक्रमा करता है. स्टेशन का एक-एक हिस्सा आपस में जुड़ा है और किसी भी एक पार्टनर की मदद के बिना यह चल ही नहीं सकता. यह न सिर्फ एक साइंटिस्ट की लेबोरेट्री है, बल्कि यह दिखाता है कि अलग-अलग देश कैसे साथ मिलकर अंतरिक्ष जैसे मुश्किल काम को अंजाम दे सकते हैं.
आखिर इसे क्यों खत्म किया जा रहा है?
असल में ISS अब अपनी निर्धारित उम्र पूरी कर चुका है. इसका कार्यकाल कई बार बढ़ाया जा चुका है, लेकिन अब इसकी हालत खराब हो रही है. ऐसे तीन बड़े कारण हैं जिनकी वजह से ISS को वापस बुलाने का फैसला लिया गया है:
1. स्टेशन का बुढ़ापा और दरारें: पिछले कुछ सालों से ISS में लगातार तकनीकी खामियां आ रही हैं. सबसे बड़ी समस्या रूसी सेक्शन के 'ज्वेज्दा' मॉड्यूल में लगातार हो रही एयर लीकेज (हवा का रिसाव) है. 5 जून 2026 को तो हालात इतने गंभीर हो गए कि नासा को अपने अंतरिक्ष यात्रियों को इवैक्यूएशन के लिए तैयार रहने का आदेश देना पड़ा था. पांच साल से भी ज्यादा समय से रूसी हिस्सों में लगातार ये दरारें और लीकेज की समस्या बनी हुई है, जिसे नासा के इंस्पेक्टर जनरल ने 'सबसे बड़ा सुरक्षा जोखिम' करार दिया है. हालांकि दरारों को सील करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन हालात बेकाबू होने के कगार पर हैं.
2. ISS को चलाना बहुत महंगा: ISS को सुरक्षित और काम करने लायक रखने के लिए हर साल अरबों डॉलर खर्च होते हैं. नासा अब इतना पैसा बढ़ती उम्र के इस स्टेशन पर लगाने की बजाय चांद और मंगल मिशन में लगाना चाहता है. आर्टेमिस प्रोग्राम के तहत नासा फिर से इंसानों को चांद पर भेजना चाहता है और उसके बाद मंगल पर भी जाने की तैयारी है.
3. कमर्शियल स्पेस स्टेशन की आमद: नासा चाहता है कि पृथ्वी की निचली कक्षा में रिसर्च और रहने का काम अब निजी कंपनियां संभालें. इसके लिए नासा कई प्राइवेट कंपनियों के साथ मिलकर नए स्पेस स्टेशन बना रहा है. इसलिए सरकारी स्टेशन यानी ISS को रिटायर करना ज्यादा समझदारी भरा कदम है.
ISS को कैसे खत्म किया जाएगा और क्या होगी पूरी प्रोसेस?
ISS को रातों-रात खत्म नहीं किया जाएगा. यह एक लंबी और बेहद सटीक योजना के तहत होगा:
- पहला चरण- अंतरिक्ष यात्रियों को निकालना (2028-2029): ISS के ऑपरेशन को धीरे-धीरे बंद किया जाएगा. 2028 के आसपास आखिरी क्रू (अंतरिक्ष यात्रियों) को ISS से सुरक्षित वापस धरती पर लाया जाएगा और उसके बाद कोई नया क्रू नहीं भेजा जाएगा.
- दूसरा चरण- पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के लिए कक्षा घटाना: जब तक ISS अपने आखिरी दौर में होगा, उसकी कक्षा को धीरे-धीरे नीचे लाया जाएगा. ऐसा करने के लिए अमेरिकी डीऑर्बिट व्हीकल (USDV) नाम का एक नया स्पेसक्राफ्ट बनाया जाएगा. नासा ने इस व्हीकल को बनाने का ठेका स्पेसएक्स को 843 मिलियन डॉलर (करीब 7000 करोड़ रुपए) में दिया है. यह व्हीकल ड्रैगन कैप्सूल का एक बड़ा और ताकतवर वर्जन होगा, जो ISS से डॉक करेगा और धीरे-धीरे उसे अपनी कक्षा से नीचे खींचेगा.
- तीसरा चरण- फाइनल डाइव और समुद्र में गिरना: सही समय पर यह USDV आखिरी जोर देकर ISS को धरती के वायुमंडल में धकेल देगा. जब ISS करीब 280 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंच जाएगा, तो यह वह प्वाइंट होगा जहां से लौटना मुमकिन नहीं है. वायुमंडल से टकराते ही गजब की गर्मी पैदा होगी, जिससे स्टेशन का ज्यादातर हिस्सा जलकर खत्म हो जाएगा. फिर भी, कुछ बड़े टुकड़े जल नहीं पाएंगे और उन्हें धरती पर गिरना होगा. इन्हीं टुकड़ों को एक खास जगह पर गिराया जाएगा. यह जगह है प्रशांत महासागर में एक सुनसान इलाका, जिसे 'स्पेसक्राफ्ट सेमेट्री' (अंतरिक्ष यानों का कब्रिस्तान) भी कहा जाता है. यहां आबादी नहीं है, इसलिए कोई नुकसान नहीं होगा.
ISS के खत्म होने के बाद क्या होगा?
ISS का खत्म होना किसी एक कहानी का अंत नहीं है, बल्कि एक नए युग की शुरुआत है. इसके बाद अलग-अलग देश क्या करने वाले हैं.
1. कमर्शियल स्पेस स्टेशन
नासा अब पृथ्वी की निचली कक्षा में रिसर्च के लिए सरकारी स्टेशन नहीं बनाएगा. इसके बजाय, वह कई अलग-अलग प्राइवेट कंपनियों को स्टेशन बनाने में मदद कर रहा है. फिर नासा इन कंपनियों से जगह किराए पर लेगा. ऐसे चार प्रमुख दावेदार हैं:
- एग्जिओम स्पेस: यह कंपनी सबसे आगे है. इसका प्लान है कि वह 2028 तक अपने स्टेशन के पहले दो हिस्सों को लॉन्च कर देगी. पहले ये हिस्से ISS के साथ जुड़े रहेंगे और बाद में अलग होकर अपना अलग स्टेशन बना लेंगे.
- ब्लू ओरिजिन: यह 'ऑर्बिटल रीफ' नाम से एक वर्सेटाइल स्टेशन बना रही है. यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म होगा जहां रिसर्च से लेकर मैन्युफैक्चरिंग और यहां तक कि टूरिज्म तक के काम हो सकेंगे.
- वोयेगर स्पेस: 'स्टारलैब' नाम से यह स्टेशन भी बन रहा है. इसकी खासियत यह है कि इसे एक ही बार में पूरा लॉन्च किया जाएगा, ना कि हिस्सों में
- वास्ट: यह कंपनी 'हैवन-1' नाम का एक छोटा और किफायती स्टेशन बना रही है, जिसकी स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट से लॉन्चिंग की योजना है.
नासा ने इन सबके लिए तकरीबन 2.1 बिलियन डॉलर (करीब 17,600 करोड़ रुपए) का बजट रखा है.
2. चीन का तियांगोंग स्पेस स्टेशन
2030 तक ISS के जाने के बाद चीन का 'तियांगोंग' (जिसका मतलब है 'स्वर्गीय महल') अंतरिक्ष में इकलौता बड़ा स्पेस स्टेशन रह जाएगा. फिलहाल यह तीन मॉड्यूल का है, लेकिन चीन इसे बढ़ाकर जल्द ही छह मॉड्यूल का करने जा रहा है. इससे इसका वजन 180 टन के करीब हो जाएगा. चीन ने इसे 15 साल तक ऑपरेट करने की योजना बनाई है. 2026 में ही चीन ने अपने दो अंतरिक्ष यात्रियों को इस स्टेशन पर भेजा है, जिनमें से एक एक साल तक वहां रहेगा.
3. भारत का भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS)
इस दौड़ में भारत भी पीछे नहीं है. इसरो अपना खुद का स्पेस स्टेशन बनाने की तैयारी में है, जिसका नाम है 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS)'. कैबिनेट ने सितंबर 2024 में ही इसके पहले मॉड्यूल (BAS-01) को 2028 तक लॉन्च करने की मंजूरी दे दी थी. हालांकि, पूरा स्टेशन पांच मॉड्यूल का होगा और इसके 2035 तक पूरा होने की उम्मीद है. एक बार बन जाने के बाद, भारत उन चुनिंदा देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जिन्होंने अपना स्पेस स्टेशन बनाया है. इसरो इस प्रोजेक्ट के लिए रूस के साथ हाथ मिलाने की भी कोशिश कर रहा है.
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का 2030 में खत्म होना तय है. यह एक ऐसे युग का अंत है, जिसने साबित किया कि अंतरिक्ष में इंसान सालों तक रह सकता है और वहां बेहतरीन वैज्ञानिक खोजें कर सकता है. लेकिन ISS के रिटायर होने के साथ ही, अब 'नए युग' की शुरुआत हो रही है, जहां प्राइवेट कंपनियों के कमर्शियल स्टेशन होंगे. भारत और चीन जैसे देश अब इस रेस में कूद चुके हैं.
