इजरायल के चुनाव परिणामों पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं. हर कोई यह जानना चाहता है कि क्या बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता में वापसी करेंगे या इस बार सत्ता विपक्ष के हाथों में जाएगी. फिलहाल, देश के दो प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स 'कान 11' और 'चैनल 13' ने अपने एग्जिट पोल के आंकड़ों में संशोधन किया है. इसके मुताबिक, नेतन्याहू और आइसेनकोट दोनों गुटों को 51-51 सीटें मिलती दिख रही हैं. वहीं, एक अन्य प्रमुख ब्रॉडकास्टर 'चैनल 12' (Channel 12) के अनुसार, नेतन्याहू के गुट को 50 सीटें और विपक्ष को 52 सीटें मिल रही हैं. रात की शुरुआत के अनुमानों की तुलना में अब दोनों के बीच का अंतर काफी कम हो गया है. बता दें कि बहुमत के साथ गठबंधन सरकार बनाने के लिए 61 संसदीय सीटों की आवश्यकता होती है.

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मंगलवार शाम को जारी शुरुआती एग्जिट पोल में आइसेनकोट के गुट को नेसेट (इजरायली संसद) में मामूली बढ़त के साथ सबसे ज्यादा सीटें मिलती दिखाई गई थीं. हालांकि, इजरायल के एग्जिट पोल अक्सर जारी होने के बाद संशोधित किए जाते हैं, क्योंकि ये पूरी तरह सटीक नहीं होते और अंतिम परिणामों में कई सीटों का अंतर आ सकता है.

शाम को 'यिसरायल बेतेनु' पार्टी के प्रमुख एविग्डोर लिबरमैन ने अपने समर्थकों को आगाह किया कि अंतिम नतीजे अभी भी बदल सकते हैं. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि आने वाले दिनों में ड्यूटी पर तैनात सैनिकों द्वारा डाले गए लाखों मतों (एब्सेंटी बैलेट्स) की गिनती होनी बाकी है.

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नेसेट का चुनावी गणित और सीटों का अजीब खेल

इजरायल की संसद (नेसेट) में कुल 120 सीटें हैं, लेकिन आज तक कभी किसी एक पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिला है. यहां चुनाव का नियम अलग है. पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है और पार्टियों को मिलने वाले कुल वोटों के प्रतिशत के हिसाब से ही संसद में सीटें मिलती हैं.

प्रधानमंत्री बनने और सरकार चलाने के लिए कम से कम 61 सीटों का समर्थन होना जरूरी है. किसी एक पार्टी को बहुमत न मिलने के कारण हमेशा मिली-जुली (गठबंधन) सरकार बनती है. इसी मजबूरी का फायदा उठाकर छोटे या क्षेत्रीय दल बड़ी पार्टियों पर हावी हो जाते हैं और अपनी शर्तें मनवाते हैं.

3.25% चुनावी थ्रेशोल्ड का जाल

इजरायल की संसद (नेसेट) में पहुंचने के लिए किसी भी पार्टी के लिए यह नियम है कि उसे देश भर में पड़े कुल वोटों का कम से कम 3.25% हिस्सा मिलना ही चाहिए (जो लगभग 4 सीटों के बराबर होता है). यह नियम इसलिए बनाया गया था ताकि संसद में बहुत ज्यादा छोटी पार्टियां न आ जाएं और सरकार आसानी से चल सके.

अगर कोई छोटी पार्टी 3.25% वोट पाने से जरा सी चूक जाती है, मान लीजिए उसे 3% वोट मिले, तो उसे एक भी सीट नहीं मिलती.

इससे उन छोटी पार्टियों को मिले लाखों वोट 'बेकार' हो जाते हैं. ये बेकार हुए वोट फिर बड़ी पार्टियों के बीच बंट जाते हैं, जिससे अचानक पूरा चुनावी गणित बदल जाता है. कभी-कभी इस एक नियम की वजह से बड़े राजनीतिक दलों का पूरा समीकरण और सरकार बनने का खेल ही बिगड़ जाता है.

गणितीय गतिरोध और ध्रुवीकृत गुट

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य मुख्य रूप से दो बड़े खेमों में बंटा हुआ है:

नेतन्याहू समर्थक खेमा: जिसका नेतृत्व 'लिकुड' पार्टी करती है और जिसमें अति-रूढ़िवादी और दक्षिणपंथी सहयोगी दल शामिल हैं.

नेतन्याहू-विरोधी विपक्ष: जिसमें मध्यमार्गी, वामपंथी और कुछ हद तक अरब नेतृत्व वाली पार्टियाँ शामिल हैं.

चूंकि दोनों मुख्य वोटिंग गुट अक्सर 58 से 60 सीटों के आसपास ही सिमट जाते हैं, इसलिए मतदान प्रतिशत में मामूली बदलाव या किसी गुट के जरूरी जादुई आंकड़े तक न पहुंच पाने की स्थिति सीधे तौर पर यह तय करती है कि स्थिर सरकार बनेगी या नहीं. जब कोई भी पक्ष 61 सीटों के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाता, तो एक गहरा राजनीतिक गतिरोध पैदा होता है, जिसके चलते लंबी और पेचीदा राजनीतिक सौदेबाजी करनी पड़ती है, कमजोर व अल्पकालिक गठबंधन बनते हैं, या फिर देश को दोबारा चुनाव के दौर से गुजरना पड़ता है.

गठबंधन की राजनीति में निरंतर टकराव

भले ही कोई गठबंधन किसी तरह 61 सीटें हासिल कर भी ले, फिर भी राजनीतिक स्थिरता पाना बेहद मुश्किल होता है. कई दलों से मिलकर बने इन गठबंधनों में सैन्य भर्ती, राष्ट्रीय वित्तीय बजट और न्यायिक सुधारों जैसी संवेदनशील नीतियों पर लगातार आपसी समझौते करने पड़ते हैं.

यदि इनमें से कोई एक छोटा दल या कुछ असंतुष्ट विधायक भी अपना समर्थन वापस ले लें, तो सरकार पलभर में अपना बहुमत खो देती है. इसी ढांचागत कमजोरी के कारण, चुनाव परिणामों और वोटों की गिनती के बाद भी अनिश्चितता और गतिरोध की स्थिति बनी रहती है, जो यरूशलेम की शासन-व्यवस्था को लगातार प्रभावित करती है.