पटना: बिहार सीएम नीतीश कुमार आज संवाददाताओं से बात करने पूरे होमवर्क के साथ आए थे. समाज कल्याण विभाग के प्रधान सचिव और बिहार के डीजीपी दोनों को साथ लेकर बैठे. कई सवालों के खुद जवाब दिए लेकिन जांच से संबंधित सवालों का जवाब देने के लिए दोनों आला अधिकारियों को सामने बैठा दिया. प्रेस के रिपोर्टर्स ने भी सवाल पूछे. जिसका जवाब दोनों ने दिया. मुजफ्फरपुर मामले पर समाज कल्याण विभाग के प्रधान सचिव अतुल प्रसाद ने कहा कि मामले की जानकारी पहले से नहीं थी. जब टीआईएसएस (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) की रिपोर्ट आई तो उसमें संक्षिप्त में उल्लेख था. कहीं से भी उसमें यौन शोषण का जिक्र नहीं था. टीआईएसएस के साथ मिलकर हमलोग पूरी रणनीति बनाते हुए 26 मई को प्रस्तुतीकरण दिया. उसके बाद उनलोगों को हिदायत दी गयी. इसके बाद सभी अपनी-अपनी जगह पर गए और बच्चियों को ट्रांस्फर किया गया. तब धीरे-धीरे ये सब बातें उजागर हुईं. मेरे पास जो प्रतिवेदन मौजूद हैं, उसमें कही भी यौन शोषण का जिक्र नहीं है. बाल सरंक्षण आयोग की तरफ से किसी यौन शोषण की बात नहीं आई. जो रिपोर्ट 22/11/2017 को आई थी इसका प्रतिवेदन 8/1/2018 को वहां से निर्गत हुआ.
मुजफ्फरपुर बालिका गृह के बारे में लिखा है कि समाज कल्याण विभाग की तरफ से संचालित यह बालिका गृह साहू रोड मुजफ्फरपुर में स्थित है. निरीक्षण के दौरान 50 बालिकाओं की क्षमता वाले बालिका गृह में 51 बालिकायें पाई गयीं. बालिकाओं के अनुपात में जगह की कमी देखी गयी. बालिकाओं की सुरक्षा हेतु महिला सुरक्षाकर्मी नहीं पाई गयीं. बालिकाओं ने बातचीत के दौरान में कहा कि शिक्षा का लाभ उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है और ना ही कौशल विकास पर ध्यान दिया जा रहा है. खेलने के लिए भी कोई सामग्री उपलब्ध नहीं कराई जा रही है.
इनपर आयोग की तरफ से नाराजगी व्यक्त की गयी और संबंधित बाल-बालिका गृह के प्रभावी परीक्षण को संबंधित बिंदुओं के निराकरण का निर्देश दिया गया. इसमें कही भी यौन शोषण की बात नहीं कही गयी है. बालिका गृह की निगरानी के लिए बनी समितियों ने जांच रिपोर्ट नहीं दी. समितियां जांच करती रही हैं, लेकिन नियमित नहीं हैं. इसकी और भी छानबीन की जा रही है. इसमें जितने भी पदाधिकारियों की संलिप्तता या लापरवाही सामने आई है, उनपर कार्रवाई की गयी है.
ब्रजेश ठाकुर के एनजीओ को कब मिला साल 2013 के नवंबर महीने में ब्रजेश ठाकुर को मुजफ्फरपुर बालिका गृह चलाने का टेंडर मिला. उस समय ये टेंडर साल 2014 तक के लिए दिया गया. इसके बाद हर साल इसको विस्तार मिलता रहा है. यह स्थानीय पदाधिकारी के प्रतिवेदन से आता था. इसके पहले जो एडीसीपी थे उनको इसिलिए सस्पेंड कर दिया गया है. बिहार के डीजीपी के एस द्विवेदी ने बताया कि जांच अब सीबीआई के हाथों है पर उसके पहले बिहार पुलिस ने जांच की थी.
बिहार के डीजीपी ने कहा कि पहले बालिकाओं के लापता होने के जो केस आते थे उसमें सिर्फ सनहा दर्ज की जाती थी. उसकी भाषा या जानकारी से कोई साक्ष्य नहीं मिल पाता था, इसलिये कोई एफआईआर दर्ज नहीं हो पाती थी. अब सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि कोई भी व्यक्ति अगर लापता हो जाए तो 24 घंटे देखने के बाद एफआईआर दर्ज करना जरूरी है. 2013 में जो बालिकायें लापता हुई थीं, उनमें से हमलोग ने खोजने का प्रयास किया है. कुछ लड़कियों के बारे में जानकारी भी मिल रही है. जो नहीं मिली हैं उनके संबंध में नया कांड अंकित कर लिया है.
डीजीपी ने कहा कि मधुबनी वाले केस में लड़की 13 साल की है, जो गूंगी है. वो रात में खुद ही भाग गयी. वहां की जो लेडी गार्ड है उसपर कार्रवाई की जा रही है. उन्होंने कहा कि जितने भी बाल गृह हैं, उसमें हम बाहरी पहरा कर सकते हैं. अगर समाज कल्याण विभाग की ओर से या शेल्टर होम की तरफ से ऐसी मांग होगी तो हम पहरेदारी करेंगे.