महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव नतीजों में बीजेपी ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए, ठाकरे ब्रदर्स की महाराष्ट्र अस्मिता केंद्रित राजनीति को विकास और विचारशील राजनीति के सामने धराशायी कर दिया है. BMC में बीजेपी अब अपना मेयर बैठाएगी. इस चुनाव नतीजों में जो सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरा, उसमें क्या असली मराठा मानुष एकनाथ शिंदे हैं? और दोनों ठाकरे ब्रदर्स में इतना अंतर क्यों है?

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क्यों छोड़ा मुंबई की जनता ने ठाकरे ब्रदर्स का साथ?

इसपर राजनीतिक एक्सपर्ट प्रफुल सारडा का कहना है कि उद्धव ठाकरे का कांग्रेस के साथ लोकसभा और विधानसभा में गठबंधन लोगों को पसंद नहीं आया है. राज ठाकरे ने हर चुनाव में अपना स्टैंड बदला है, जिस वजह से लोगों ने उनपर भरोसा नहीं किया. जनता विकास की राजनीति और विचारशील राजनीति के साथ गई है. बीजेपी को इसी का फायदा मिला है. इसके अलावा शिंदे, राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की शिवसेना को नुकसान हुआ है. बीजेपी ने अपनी सीट रिटेन की है. एकनाथ शिंदे को ग्राउंड पकड़ना था. उनका ग्राउंड थाणे तक सीमित था. उनका मुंबई और नवी मुंबई में प्रदर्शन अच्छा रहा है, जो आने वाले सालों में बेहतर ही होगा. लोगों का भरोसा जीतने में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे कम पड़ गए. 70-72 सीटों का आंकड़ा सम्मान जनक है. लोगों को कन्फ्यूज राजनीति या लीडरशिप नहीं चाहिए. देवेंद्र फणवीस इन्फ्रामैन बनकर महाराष्ट्र राजनीति में उभरे हैं. 

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क्या राज ठाकरे को अपनी राजनीति बदलने की जरूरत है?राजनीतिक एक्सपर्ट्स ने इस सवाल पर कहा, 'मुझे नहीं मालूम की राज ठाकरे अपनी राजनीति में बदलाव करेंगे. उनका पूरा रोष मराठी मानुष की राजनीति के इर्द गिर्द रहा है. लेकिन मराठी मानुष को समझना पड़ेगा कि कुछ जगहों पर पहुंचने के लिए काबिलियत होना जरूरी है. मराठी मानुष का झगड़ा रोजमर्रा जीवन या रोजगार से जुड़ा नहीं है. कबिलियत महत्व रखाती है. कहीं न कहीं राज ठाकरे इन चीजों को नजरंदाज कर रहे हैं. उद्धव ठाकरे इसके उलट बात करते हैं. राज ठाकरे चुनाव प्रचार के समय सिर्फ मराठी मानुष की बात कर रहे थे, और उद्धव ठाकरे हिंदुओं की बात कर रहे थे. जनता में कन्फ्यूजन बना हुआ था. राज ठाकरे आने वाले समय में थोड़े सॉफ्ट जरूर नजर आ सकते हैं. वह उद्धव ठाकरे के रंग में घुलने लगेंगे. यह उनके लिए फायदेमंद रहेगा.'