सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच की परिभाषा तय करने और ऐसे मामलों में कार्रवाई की मांग पर कोई आदेश देने से मना कर दिया है. कोर्ट ने कहा है कि अपराध की परिभाषा और उसकी सजा तय करना उसका काम नहीं है. नफरत फैलाने वाले बयानों को लेकर कानून में पहले से व्यवस्था है. संसद अगर चाहे तो उसके अलावा भी कानून बना सकती है.

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सुप्रीम कोर्ट ने जिन याचिकाओं पर यह फैसला दिया है, उन्हें धर्म संसद जैसे आयोजनों के अलावा टीवी पर दिखाए गए कई भड़काऊ कार्यक्रमों को लेकर दाखिल किया गया था. याचिकाकर्ताओं ने 'कोविड जिहाद' और 'यूपीएससी जिहाद' जैसे टीवी कार्यक्रमों के अलावा सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जाने वाले कुछ एआई वीडियो का भी मसला कोर्ट में रखा था, लेकिन जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इन मामलों पर अलग से कोई आदेश देने से मना कर दिया.

ध्यान रहे कि साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस तरह के मामलों में पुलिस को बिना शिकायत का इंतजार किए खुद FIR दर्ज करनी चाहिए. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि पुलिस अभी भी ऐसे मामलों में ढीला रवैया दिखा रही है.

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कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी और उसके बदले लागू किए गए बीएनएसएस में इसे लेकर पर्याप्त व्यवस्था है. अगर थाना प्रभारी केस नहीं दर्ज कर रहा हो तो शिकायतकर्ता एसपी को आवेदन दे सकता है. अगर वहां भी समाधान न मिले तो सीआरपीसी 156(3) या बीएनएसएस 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दे सकता है.

कोर्ट में जो याचिकाएं दाखिल हुई थीं, उनमें नई रिट याचिकाओं के अलावा अवमानना से जुड़े आवेदन भी शामिल थे. अवमानना याचिकाओं में कोर्ट के पुराने आदेशों पर अमल न होने की शिकायत की गई थी, लेकिन 2 जजों की बेंच ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है.

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सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ एक मामले की सुनवाई जारी रखने की बात कही है. यह मामला उत्तर प्रदेश के नोएडा में काजिम अहमद शेरवानी नाम के याचिकाकर्ता के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार से जुड़ा है. इस मामले में जांच अधिकारी के रवैए को मनमाना बताते हुए कोर्ट ने पिछले सप्ताह नाराजगी जताई थी और चार्जशीट में सही कानूनी धाराएं जोड़ने का आदेश दिया था.