सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच को लेकर दायर याचिकाओं पर कोई दिशानिर्देश जारी करने से इनकार कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून में पहले से व्यवस्था है कि संसद अगर चाहे तो और कानून बना सकती है. ये याचिकाएं धर्म संसद और टीवी पर दिखाए गए भड़काऊ कार्यक्रमों समेत कई मामलों को लेकर दाखिल की गई थीं, लेकिन कोर्ट ने उन पर कोई आदेश देने से मना कर दिया.

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कोर्ट ने कहा, हमारा निष्कर्ष है कि- 

  • अपराध की परिभाषा तय करना और कानून बनाना विधायिका का काम है.
  • अभी भी प्रभावी कानून मौजूद हैं.
  • संज्ञेय अपराध पर एफआईआर करना पुलिस का काम है.
  • अगर एफआईआर दर्ज न हुई हो तो एसपी या मजिस्ट्रेट के पास जाया जा सकता है

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, 'हालांकि, हम कोई निर्देश नहीं दे रहे, लेकिन हम मानते हैं कि इस तरह के मामले सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करते हैं. अगर संसद उचित समझे तो इस पर और कानून बना सकती है. सभी याचिकाओं को इन निर्देशों  के साथ खारिज किया जा रहा है.'

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून नफरती भाषणों जैसे अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त है और यह धारणा गलत है कि नफरती भाषण के अपराध को कानून में शामिल नहीं किया गया है. बेंच ने यह भी कहा कि किसी अपराध को परिभाषित करना न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र से बाहर है क्योंकि यह पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है.

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सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी को कहा था कि वह 2021 से लंबित नफरती भाषणों से संबंधित अधिकांश याचिकाओं का निपटारा कर देगा, जिनमें कोर्ट ने पुलिस को स्वतः संज्ञान लेते हुए प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया था. केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कोर्ट के निर्देशों का पर्याप्त रूप से अनुपालन करने की बात कहे जाने के बाद, बेंच ने विभिन्न व्यक्तियों की ओर से दायर इन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

 

(निपुण सहगल के इनपुट के साथ)