जनगणना में जातियों के आधार पर गिनती के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा है कि यह नीतिगत मसला है. वह इसमें दखल नहीं देगा. अगर सरकार पिछड़ी जातियों की गणना नहीं करेगी तो उनके लिए कल्याण योजनाएं लागू करना मुश्किल होगा.

Continues below advertisement

हाल ही में शुरू राष्ट्रीय जनगणना से जातिगत गणना को बाहर रखने की मांग वाली यह याचिका हैदराबाद के रहने वाले सुधाकर गुम्मुला ने दाखिल की थी. याचिकाकर्ता की दलील थी कि जातिगत डेटा के संग्रह से सामाजिक और राजनीतिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं. इस आंकड़े का एजेंसियों की तरफ से दुरुपयोग किया जा सकता है.

यह भी पढ़ें:- 'प्रदर्शन करो, पर सड़कों पर उतरकर लोगों को परेशान मत करो', नवी मुंबई एयरपोर्ट का नाम बदलने की मांग पर बोले CJI

Continues below advertisement

मामला चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच में सुनवाई के लिए लगा. जजों ने याचिकाकर्ता के तर्क को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने साफ किया कि जनगणना में जाति आधारित आंकड़ों को शामिल करना या न करना पूरी तरह से नीतिगत मसला है, जो सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है. कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता.

यह भी पढ़ें:- 'पुजारियों के चक्कर में मत पड़िए, वे कितना...', मंदिरों के सेवादारों और कर्मचारियों के लिए वेतन की मांग कर रहे याचिकाकर्ता से क्यों ऐसा बोला SC?

यह भी पढ़ें:- 'आंखें नहीं मूंद सकते, अगर जरूरत पड़े तो...', आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 5 बड़ी बातें

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि कल्याणकारी योजनाओं को लागू करते समय पिछड़े वर्गों और दूसरे सामाजिक समूहों की सही स्थिति को समझना जरूरी है. इसके लिए सरकार को सही आंकड़ों की जरूरत है. जनगणना के जरिए यह आंकड़े जुटाए जा सकते हैं.

यह भी पढ़ें:- आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 'बिना डर के जीना और घूमना नागरिकों का मौलिक अधिकार, राज्य करें नियमों के मुताबिक कार्रवाई'