कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बनने से उनके और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच सालों से चल रही नेतृत्व की खींचतान भले ही आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गई हो लेकिन राजनीति में सत्ता हस्तांतरण के साथ ही प्रभाव की होड़ शायद ही कभी समाप्त होती है. ऐसे में शुरुआती संकेत बताते हैं कि सिद्धारमैया ने राज्य की सत्ता पर अपनी पकड़ पूरी तरह से नहीं छोड़ी है और कर्नाटक की सत्ता में अभी भी उनके हाथ में निर्णायक भूमिका हो सकती है.

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सिद्धारमैया का दबदबा कायमइस बात का सबसे स्पष्ट संकेत कि सिद्धारमैया के हाथ में ही सारी शक्तियां हैं, नए मंत्रिमंडल के आकार में ही छिपा है, जहां मंत्रियों का संतुलन सिद्धारमैया के कांग्रेस और सरकार में निरंतर प्रभाव को दर्शाता है, भले ही शिवकुमार ने औपचारिक रूप से सीएम का पद ग्रहण कर लिया हो.

इसके अलावा सिद्धारमैया को कांग्रेस की कार्यकारी समिति (सीडब्ल्यूसी) में पदोन्नत किए जाने और बेंगलुरु स्थित मुख्यमंत्री बंगले में उनके निवास को बनाए रखने से भी इस तर्क को बल मिलता है. ये सभी घटनाक्रम दर्शाते हैं कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी सिद्धारमैया कांग्रेस और कर्नाटक की राजनीति में अपना दबदबा बनाए हैं.

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डिप्टी सीएम भी सिद्धारमैया के करीबीशिवकुमार के अलावा 12 कांग्रेस विधायकों ने बुधवार को मंत्री पद की शपथ ली. इनमें आधा दर्जन से अधिक नेता कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे सिद्धारमैया द्वारा समर्थित विधायक हैं. ऐसी अटकलें थीं कि शिवकुमार सरकार में कई उपमुख्यमंत्री होंगे, लेकिन पूर्व गृह मंत्री जी परमेश्वर इस पद को संभालने वाले एकमात्र नेता के रूप में उभरे, जबकि परमेश्वर को सिद्धारमैया का करीबी माना जाता है. मंत्रिमंडल में अब 14 सदस्य हैं और 18 जून को राज्यसभा चुनाव के बाद संख्या और बढ़ने की उम्मीद है.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक कांग्रेस इकाई में 2 गुट हैं जो पार्टी के कामकाज पर हावी हैं और दोनों का नेतृत्व सिद्धारमैया और शिवकुमार कर रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि नेताओं का एक ऐसा ग्रुप भी है जो उदारवादी है और किसी भी गुट से संबंधित नहीं है.

कांग्रेस ने घोषणा की थी कि शिवकुमार 3 जून को शपथ लेंगे. इसी के चलते 2 जून की देर रात तक शिवकुमार और सिद्धारमैया अंतिम सूची तैयार करने के लिए दिल्ली में डटे थे. सूत्रों के मुताबिक मंत्रियों के चयन के दौरान काफी गहमागहमी हुई, क्योंकि सिद्धारमैया और डीकेएस गुट मंत्रिमंडल में अधिक प्रतिनिधित्व के लिए दबाव बना रहे थे.

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