Gen Z और जेन-अल्फा के साथ 6 अगस्त 2026 को मुंबई में एक इंटरैक्शन हुआ. RSS प्रमुख मोहन भागवत ने चार ऐसे मुद्दों पर अपनी राय रखी जो भारतीय राजनीति और समाज के बेहद संवेदनशील विषय हैं- रिजर्वेशन, जनसंख्या नीति, मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव और पाकिस्तान से बातचीत. भागवत ने इन मुद्दों पर एक साथ बात की और हर मुद्दे पर उनका रुख हैरान करने वाला, विवादास्पद और कई बार विरोधाभासी भी लगा. आइए इन चारों मुद्दों को एक-एक करके समझते हैं...
पहला मुद्दा- रिजर्वेशन: 'जब तक भेदभाव है, आरक्षण जारी रहेगा'
मोहन भागवत ने रिजर्वेशन पर साफ रुख अपनाते हुए कहा, 'जब तक सामाजिक भेदभाव है, आरक्षण जारी रहेगा.' भागवत ने कहा, 'आरक्षण सामाजिक कारणों से है. जब तक सामाजिक भेदभाव है, आरक्षण जारी रहेगा.'
भागवत ने इस मुद्दे को डॉ. भीमराव अंबेडकर के नजरिए से देखने की अपील की और कहा कि राजनीति से इसे दूर रखा जाना चाहिए. भागवत ने कहा, 'अगर हम अंबेडकर की सलाह को ईमानदारी से फॉलो करें तो कोई दिक्कत नहीं है.'
'जिन्हें फायदा हुआ, वे त्याग दें'
सबसे दिलचस्प बात भागवत ने यह कही कि जिन्हें आरक्षण मिला और जिनकी स्थिति सुधर गई है, उन्हें उदारता दिखाते हुए इसे छोड़ देना चाहिए. भागवत ने कहा कि आरक्षण 'स्थायी उपाय' नहीं है और जो लोग इससे तरक्की कर चुके हैं, वे स्वेच्छा से इसका लाभ दूसरों को देने के लिए तैयार हों.
भागवत ने राजनीतिक दलों पर भी निशाना साधा बिना नाम लिए, 'आरक्षण को राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया, जिससे समाज में कटुता पैदा हुई.' उन्होंने कहा कि तलवार चलाने वाले लोग इसे गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं. अगर आरक्षण को ईमानदारी से लागू किया जाए और कल्याणकारी योजनाएं सही लोगों तक पहुंचें, तो आरक्षण की जरूरत धीरे-धीरे कम हो सकती है.
क्या यह पहले से अलग है?
भागवत ने 2018 में भी कहा था कि आरक्षण जारी रहना चाहिए. हालांकि, 2023 में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, 'जब तक समाज में भेदभाव है, आरक्षण बरकरार रहना चाहिए.' 2026 में उन्होंने यह बात दोहराई और आगे कहा, 'अगर 200 साल भी आरक्षण देना पड़े तो दें.'
दूसरा मुद्दा- कितने बच्चे: 'तीन बच्चे जरूरी, वरना खतरा'
मोहन भागवत ने जनसंख्या नीति पर साफ कहा कि हर हिंदू परिवार में कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए. 24 मार्च 2026 को वृंदावन में एक आश्रम के उद्घाटन के दौरान उन्होंने कहा था, 'तीन बच्चों से कम होना हिंदुओं के लिए खतरनाक होगा.'
भागवत ने कहा, 'डॉक्टर अच्छे पारिवारिक स्वास्थ्य के लिए तीन बच्चों की सलाह देते हैं.' उन्होंने कहा कि बचपन में भाई-बहनों के साथ रहने से सामाजिक कौशल विकसित होते हैं और आगे चलकर तलाक जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है.
भागवत ने कहा कि जनसंख्या डेटा के मुताबिक, 'तीन से कम प्रजनन दर लंबी अवधि के जोखिम पैदा करती है.' उन्होंने कहा, 'दुनिया के कई देशों में जहां जन्म दर कम थी, वहां तीन बच्चों का मानदंड अपनाया गया.'
जनसंख्या नीति की समीक्षा की मांग
भागवत ने भारत की जनसंख्या नीति की समीक्षा की मांग की. उन्होंने कहा, 'हमारी जनसंख्या नीति की समीक्षा होनी चाहिए और हमें 50 साल बाद जनसंख्या दर के स्वास्थ्य, शिक्षा और खाद्य उपलब्धता पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करना चाहिए.' हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कानून बनाने में जल्दबाजी न करें, पहले सभी नागरिकों को समझाने की कोशिश करें.
गैरकानूनी घुसपैठियों पर सख्ती
भागवत ने गैरकानूनी घुसपैठियों के मुद्दे को भी उठाते हुए कहा कि घुसपैठियों को भारत में कोई रोजगार नहीं मिलना चाहिए. उन्होंने लोगों से अपील की है कि सतर्क रहें, घुसपैठियों की पहचान करें और अधिकारियों को सूचित करें.
तीसरा मुद्दा- मुसलमान: 'सभी को एक ब्रैकेट में मत डालो'
नवंबर 2025 में बेंगलुरु में RSS के शताब्दी वर्ष समारोह के दौरान भागवत ने मुस्लिम समुदाय पर एक बड़ा बयान दिया था, 'सभी मुसलमानों को एक ब्रैकेट में नहीं डाला जा सकता.' उन्होंने कहा कि देश में ज्यादा मुसलमान 'लव जिहाद' या 'गजवा-ए-हिंद' का समर्थन नहीं करते, लेकिन समुदाय में 'कट्टरपंथियों का एक बड़ा वर्ग' भी है. उन्होंने कहा, 'अच्छे लोगों को बुरे लोगों की भीड़ से अलग करना होगा.'
'भेदभाव मत करो, लेकिन सतर्क रहो'
अगस्त 2025 में भागवत ने कहा, 'हिंदू-मुस्लिम पहले से ही एक हैं, मुसलमानों को समान नौकरी के अधिकार मिलने चाहिए.' उन्होंने कहा, 'धार्मिक अल्पसंख्यकों को सिर्फ इसलिए अलग नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि उनकी पूजा का तरीका अलग है.' हालांकि उन्होंने यह भी कहा, 'समाज को घुसपैठियों से सुरक्षा के लिए सतर्क रहना चाहिए.'
RSS में मुस्लिम- 'हिंदू बनकर आओ'
सबसे विवादास्पद बात भागवत ने तब कही जब उनसे RSS में मुसलमानों की सदस्यता के बारे में पूछा गया. उन्होंने कहा, 'RSS में कोई ब्राह्मण नहीं आ सकता, कोई मुसलमान नहीं, कोई ईसाई नहीं. सिर्फ हिंदू आ सकते हैं.' हालांकि उन्होंने यह भी कहा, 'अगर कोई मुसलमान या ईसाई अपनी 'अलग पहचान' छोड़कर 'हिंदू' (जिसे उन्होंने 'भारत माता का पुत्र' परिभाषित किया) बनकर आए तो वह आ सकता है.'
चौथा मुद्दा- पाकिस्तान से बातचीत: 'हम हिटलर नहीं, बातचीत के दरवाजे खुले रखने होंगे'
14 जून 2026 को तिरुवनंतपुरम में RSS शताब्दी समारोह के दौरान भागवत ने पाकिस्तान के साथ बातचीत पर अपना रुख स्पष्ट किया था, 'हम सरकार की नीति का पालन करेंगे, लेकिन पाकिस्तान के लोगों के साथ बातचीत के दरवाजे खुले रखने चाहिए.'
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि भारत का विभाजन गलत था. उन्होंने यह भी कहा, 'वहां एक अंडरकरंट है जो पाकिस्तान विरोधी है और दो-राष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ है.'
'हम हिटलर नहीं हैं'
भागवत ने कहा, 'हम हिटलर की तरह नहीं हैं. यह हमारा स्वभाव या हमारा तरीका नहीं है. इस वजह से हमें कुछ दरवाजे खुले रखने चाहिए.' उन्होंने कहा कि अन्याय और अत्याचार को हराना चाहिए, लेकिन जो अच्छा है उसे संरक्षित करना चाहिए.
'स्थायी दुश्मनी समाधान नहीं'
6 अगस्त 2026 को भागवत ने कहा, 'पाकिस्तानी भारतीयों के स्थायी दुश्मन नहीं हैं.' उन्होंने कहा कि स्थायी दुश्मनी, स्थायी घृणा समाधान नहीं है. भागवत ने कहा, 'संघर्ष के समय हम सरकार और सेना के साथ हैं, लेकिन हम जानते हैं कि कभी-कभी इसे रोकना पड़ता है. हमें एक होना पड़ता है, क्योंकि मानवता एक है.'
'पाकिस्तान 100 साल पहले भारत था'
भागवत ने कहा, 'पाकिस्तान 100 साल पहले भारत था. इसे भूलना नहीं चाहिए.' उन्होंने कहा कि ये बंधन तोड़े नहीं जा सकते, इन्हें संघर्ष के दौरान रोका जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं.
संघ की चार मुद्दों पर एक रणनीति
मोहन भागवत ने इन चार मुद्दों पर जो रुख अपनाया है, वह कई मायनों में संघ की पारंपरिक छवि से अलग है:
- रिजर्वेशन पर उन्होंने अंबेडकर का हवाला देते हुए इसे जारी रखने की बात कही. यह संघ के आलोचकों के लिए हैरान करने वाला था.
- जनसंख्या पर उन्होंने तीन बच्चों की वकालत की और गैरकानूनी घुसपैठियों के खिलाफ सख्ती की बात कही.
- मुस्लिम समुदाय पर उन्होंने भेदभाव न करने की बात तो कही, लेकिन साथ ही RSS में सिर्फ हिंदू की बात दोहराई.
- पाकिस्तान पर उन्होंने बातचीत के दरवाजे खुले रखने की बात कही, लेकिन सरकार की नीति का समर्थन करने की भी बात कही.
यह चारों मुद्दे भारतीय राजनीति के बेहद संवेदनशील विषय हैं. भागवत के इन बयानों ने एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या यह संघ के रुख में बदलाव है या पुरानी बातों को नए शब्दों में पेश करना? यह सवाल आने वाले दिनों में और गहराएगा.
