केरल हाईकोर्ट ने कक्षा में आपस में झगड़ रहे तीन छात्रों को बेंत मारने के मामले में एक स्कूली शिक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि उसका इरादा छात्रों को चोट पहुंचाने का नहीं बल्कि केवल अनुशासन लागू करने का था.

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जस्टिस सी. प्रतीप कुमार ने कहा कि कक्षा पांच के छात्रों के बयान के अनुसार, वे कक्षा में एक-दूसरे से लाठियां लेकर लड़ रहे थे और उसी समय गणित के शिक्षक ने 'अनुशासन लागू करने' के लिए हस्तक्षेप किया. कोर्ट ने कहा कि शिक्षक ने छात्रों के केवल पैरों पर ही बेंत मारी, उनमें से किसी को भी किसी चिकित्सा उपचार की आवश्यकता नहीं पड़ी और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इस घटना में उनमें से किसी को भी शारीरिक चोट लगी हो.

अदालत ने यह भी पाया कि घटना 16 सितंबर, 2019 की सुबह घटी थी, लेकिन पुलिस को इसकी सूचना 20 सितंबर, 2019 की शाम लगभग 8.30 बजे दी गई. अदालत ने कहा, 'उपर्युक्त देरी का कोई कारण नहीं बताया गया. याचिकाकर्ता (शिक्षक) ने छात्रों पर लाठीचार्ज करते समय केवल न्यूनतम बल का प्रयोग किया है.'

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अदालत ने अपने 16 अक्टूबर के आदेश में कहा, 'चूंकि याचिकाकर्ता ने केवल न्यूनतम शारीरिक दंड का प्रयोग किया था, वह भी केवल कक्षा में अनुशासन लागू करने के लिए, इसलिए यह स्पष्ट है कि कक्षा में अनुशासन लागू करने के लिए आवश्यक सीमा से अधिक छात्रों को चोट पहुंचाने का उसका कोई इरादा नहीं था.'

अदालत ने आगे कहा कि शिक्षक का यह कदम केवल छात्रों को सुधारने और उन्हें अच्छे नागरिक बनाने के लिए था. अदालत ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि माता-पिता शिक्षक के 'अच्छे इरादे' को नहीं समझ पाए और इसी वजह से यह अनुचित मुकदमा चलाया गया.

जस्टिस कुमार ने हाईकोर्ट के विभिन्न पूर्व आदेशों का भी हवाला दिया, जिसमें न्यायालय ने कहा था कि जब छात्र की भलाई और अनुशासन बनाए रखने के लिए शारीरिक दंड देने में शिक्षक की ओर से कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं होता है, तो यह कहना संभव नहीं है कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत कोई अपराध बनता है.

शिक्षक पर भारतीय दंड संहिता की धारा 324 (खतरनाक हथियारों या साधनों से जानबूझकर चोट पहुंचाना) और किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 (बच्चों के प्रति क्रूरता) के तहत मामला दर्ज किया गया था.

कोर्ट ने कहा, 'जब कोई छात्र स्कूल के नियमों के अनुसार उचित व्यवहार या कार्य नहीं करता है, और यदि शिक्षक उसके चरित्र और आचरण में सुधार के लिए उसे शारीरिक दंड देता है, तो अदालत को यह पता लगाना होगा कि शिक्षक का उक्त कार्य सद्भावनापूर्ण था या नहीं. यदि यह पाया जाता है कि उसने केवल छात्र को सुधारने या सुधारने के इरादे से कार्य किया था, तो वह अपनी सीमा के भीतर है.'