समझिए, आप अपने घर में रहते हैं. शुरू में परिवार के कुछ ही लोग थे, फिर धीरे-धीरे पड़ोसी, रिश्तेदार आते गए और एक दिन आपको लगा कि घर का पूरा माहौल ही बदल गया. कुछ वैसा ही हाल हमारे पूरे देश का हो रहा है, कम से कम सरकार को तो ऐसा ही लग रहा है. सरकार का कहना है कि देश की आबादी का जो ताना-बाना है, वो बहुत तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है- जानबूझकर की जा रही घुसपैठ. इसी पूरे मसले की जांच के लिए सरकार ने एक खास टीम बना दी है, जिसका नाम है हाई-लेवल कमेटी ऑन डेमोग्राफिक चेंज. आखिर ये कमेटी है क्या, इसमें कौन-कौन है और आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?

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ये कमेटी है क्या बला?

ये कोई अदालत या संसद नहीं है. इसे ऐसे समझिए कि सरकार ने देश के बदलते चेहरे की जांच के लिए एक 'ऑफिशियल जांच बैठा दी है'. ये टीम पूरे देश का दौरा करेगी, आंकड़े जुटाएगी और पता लगाएगी कि किन इलाकों में किस तरह से आबादी का ताना-बाना बदल रहा है. इसके बाद ये सरकार को बताएगी कि अब आगे क्या करना है, ताकि देश की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और सामाजिक ढांचा मजबूत बना रहे.

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कौन-कौन है इस टीम में?

ये टीम बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन इसके सदस्य बेहद तगड़े बैकग्राउंड से आते हैं. कुल 6 लोग हैं जिनको ये जिम्मेदारी सौंपी गई है:

  1. टीम के मुखिया (अध्यक्ष): सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ रिटायर्ड जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर.
  2. सदस्य: मृत्युंजय कुमार नारायण. ये हमारे देश के जनगणना आयुक्त हैं, मतलब इनके पास देश की पूरी आबादी का हिसाब-किताब रहता है.
  3. सदस्य: दुर्गा शंकर मिश्रा. ये रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं और प्रशासन के मामले में इनका बहुत गहरा अनुभव है.
  4. सदस्य: बालाजी श्रीवास्तव. ये रिटायर्ड IPS अधिकारी हैं, जांच और सुरक्षा के मसले इनकी हथेली पर हैं.
  5. सदस्य: डॉ. शमिका रवि. ये एक जानी-मानी अर्थशास्त्री हैं, जो आंकड़ों और उसके पीछे की अर्थव्यवस्था को बखूबी समझती हैं.
  6. सदस्य सचिव: गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (विदेशी-I). ये सदस्य टीम में सबकी मदद करने और पूरी कार्यवाही को सुचारू रखने का काम देखते हैं.

इस कमेटी के हाथ में क्या-क्या ताकत और काम हैं?

सरकार ने इस कमेटी को खाली हाथ नहीं भेजा है. इसे 5 बड़े काम सौंपे गए हैं:

  1. पूरा हिसाब लगाना: ये कमेटी अवैध घुसपैठ और दूसरी असामान्य वजहों से देश के कोने-कोने में आबादी के ढांचे में आए बदलाव का बारीकी से आकलन करेगी.
  2. पैटर्न खोजना: ये देखना कि अलग-अलग धर्मों और सामाजिक समुदायों में जनसंख्या का जो अनुपात बदल रहा है, उसका कोई खास तरीका या पैटर्न तो नहीं है.
  3. जड़ तक जाना: सिर्फ ऊपर-ऊपर से नहीं, बल्कि इस बदलाव के पीछे जो असली वजह है, उसकी तह तक जाकर पूरी गुत्थी सुलझानी होगी.
  4. रास्ता सुझाना: जब पूरी पड़ताल हो जाए, तो इन बदलावों से निपटने के लिए एक पक्का, चरणबद्ध और समयसीमा वाला खाका तैयार करना होगा.
  5. नए उपाय बताना: जरूरत पड़ने पर सरकार को सुझाव देना कि क्या नए कानून बनाने पड़ सकते हैं, क्या नई नीतियां लानी होंगी और प्रशासनिक स्तर पर क्या बदलाव करने होंगे.

क्या पहले भी ऐसी कोई कमेटी बनी थी?

जी हां, आबादी के मसले पर सरकार का ध्यान पहली बार नहीं गया है. इससे पहले भी दो बड़े कदम उठ चुके हैं, जिनका जिक्र करना जरूरी है:

  • राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग (NCP, 2000): तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने इस विशाल आयोग का गठन किया था, जिसमें 100 से भी ज्यादा सदस्य थे. इसका काम 'राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000' को लागू करना और उस पर नजर रखना था, ताकि देश की बढ़ती आबादी को स्वैच्छिक तरीके से स्थिर किया जा सके.
  • प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (PM-EAC) की रिपोर्ट, 2024: एक बेहद चर्चित रिपोर्ट आई, जिसका शीर्षक था 'शेयर ऑफ रिलीजियस माइनॉरिटीज: ए क्रॉस कंट्री एनालिसिस'. ये कोई कमेटी नहीं थी, बल्कि एक गहरा अध्ययन था. इसके मुताबिक 1950 से 2015 के बीच भारत में हिंदू आबादी का अनुपात 7.82% घट गया, जबकि मुस्लिम आबादी का अनुपात 9.84% से बढ़कर 14.09% हो गया.

अब तक सरकार ने जनसंख्या के बदलाव पर क्या कहा?

सरकार और उसकी संस्थाओं ने समय-समय पर जनसंख्या के बदलते चेहरे पर चिंता जताई है:

1. PM-EAC रिपोर्ट, 2024 की खास बातें

  • 1950-2015 के 65 सालों के आंकड़ों ने दिखाया कि देश में बहुसंख्यक हिंदू आबादी का अनुपात लगातार घटा है.
  • भारत में अल्पसंख्यकों के रहने के लिए एक 'अनुकूल माहौल' है, जो उनकी आबादी के बढ़ने का एक कारण हो सकता है.
  • पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे भारत के पड़ोसी देशों में बहुसंख्यक आबादी का अनुपात बढ़ा है, जबकि अल्पसंख्यकों की संख्या में भारी गिरावट आई है. भारत में ये रुझान बिल्कुल उल्टा है.

2. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 का रुख

  • इस नीति का पूरा जोर परिवार नियोजन, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के जरिये, लोगों को खुद से छोटा परिवार रखने के लिए प्रेरित करने पर था. इसमें किसी भी तरह की जबरदस्ती की कोई जगह नहीं थी.

3. जनगणना के आंकड़ों का सहारा

  • सरकार अपनी बात को साबित करने के लिए स्थानीय स्तर के आंकड़े भी पेश करती रही है. जैसे, झारखंड के संथाल परगना इलाके का उदाहरण दिया जाता है. वहां 1951 से 2011 के बीच जनजातीय आबादी 45% से गिरकर सिर्फ 27% रह गई, जबकि इसी दौरान वहां मुस्लिम आबादी में 13% की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई.

अब इस कमेटी का सबसे ज्यादा फोकस किन पर होगा?

ये कमेटी पूरे देश का आकलन करेगी, लेकिन सरकार के बयानों और कमेटी के कामों से साफ है कि इसका पूरा जोर किन मुद्दों और इलाकों पर रहेगा:

  • अवैध घुसपैठिए: गृह मंत्री ने साफ शब्दों में कहा है कि घुसपैठ की वजह से जो जनसंख्या बदलाव हो रहा है, वो एक बड़ी चुनौती है.
  • सीमावर्ती राज्यों पर खास नजर: जिन राज्यों की सीमाएं दूसरे देशों से लगती हैं, वो इस जांच के केंद्र में होंगे. इनमें सबसे ऊपर नाम असम और पश्चिम बंगाल का है, क्योंकि ये बांग्लादेश से सटे हुए हैं. पूरे पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति भी बारीकी से देखी जाएगी. जम्मू-कश्मीर भी इस लिस्ट में शामिल है.
  • अलग-अलग धर्मों और समुदायों का आकलन: कमेटी को सीधे-सीधे ये हिदायत दी गई है कि वो धार्मिक और सामाजिक समुदायों के स्तर पर होने वाले 'असामान्य बदलावों' की तहकीकात करे. इसलिए, उनका फोकस इस बात पर होगा कि किस समुदाय विशेष की आबादी किसी इलाके में तेजी से क्यों और कैसे बदल रही है.

क्या स्पेशल जोन जैसा कुछ बन सकता है?

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ये सवाल हर किसी के मन में है, और इसका जवाब अभी पूरी तरह से साफ नहीं है:

  • अभी तक कोई खाका नहीं: सरकार ने अभी तक अपनी किसी भी घोषणा में 'स्पेशल जोन' बनाने जैसी किसी योजना का जिक्र नहीं किया है. ये अभी सिर्फ लोगों के मन में उठ रहे सवाल हैं.
  • पर मुमकिन है: चूंकि कमेटी का एक बड़ा काम 'नए कानूनी और प्रशासनिक उपाय' सुझाना भी है, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि वो अपनी भविष्य की रिपोर्ट में उन इलाकों के लिए किसी विशेष व्यवस्था या 'स्पेशल जोन' जैसी किसी स्कीम की सिफारिश जरूर कर सकती है जो जनसांख्यिकीय बदलाव से सबसे ज्यादा पस्त हैं. लेकिन ये सब भविष्य के गर्त में छिपी बातें हैं. पूरी तस्वीर तभी साफ होगी जब कमेटी अपनी रिपोर्ट सौंप देगी और सरकार उस पर कोई एक्शन लेगी.