Synthetic Cells Research University Of Minnesota: बायोलॉजी के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल करने का दावा किया है. रिसर्चर ने ऐसी सिंथेटिक सेल्स विकसित की हैं, जो प्राकृतिक सेल्स की तरह पोषण लेकर बढ़ सकती हैं और अपनी संख्या भी बढ़ा सकती हैं. साइंटिस्ट का मानना है कि यह खोज भविष्य में निर्जीव पदार्थों से जीवित जैसे सिस्टम विकसित करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है. इस परियोजना को स्पडसेल नाम दिया गया है और इसे अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है. 

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क्या है इसका खासियत?

रिसर्च का नेतृत्व करने वाली वैज्ञानिक केट एडामाला के मुताबिक, उनकी टीम ने केमिस्ट्री की मदद से उन प्रक्रियाओं को दोहराने में सफलता हासिल की है, जिन्हें अब तक केवल जीवित सेल्स की विशेषता माना जाता था. उनका कहना है कि सेल्स का बढ़ना और अपनी प्रतिकृति बनाना जैसे जीवन के मूल गुण किसी रहस्यमयी शक्ति पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि इन्हें वैज्ञानिक तरीके से भी तैयार किया जा सकता है. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्पडसेल को पूरी तरह जीवित जीव नहीं कहा जा सकता. 

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दरअसल, यह सिंथेटिक सेल्स अभी भी कई मामलों में प्राकृतिक सेल्स से पीछे है. इसे जीवित रहने के लिए बाहर से पोषक तत्व और राइबोसोम की जरूरत पड़ती है, जो प्रोटीन बनाने का काम करते हैं. इसके अलावा इसमें खुद को इंफेक्शन से बचाने की क्षमता नहीं है और न ही यह अपशिष्ट पदार्थों को प्रभावी ढंग से बाहर निकाल सकती है. यानी यह अपने आप लंबे समय तक जीवित रहने में सक्षम नहीं है. 

क्यों इस खोज को माना जा रहा महत्वपूर्ण?

एक्सपर्ट इस उपलब्धि को बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं. उनका कहना है कि पहली बार किसी सिंथेटिक प्रणाली में जीवन जैसी मूलभूत प्रक्रियाओं को सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया है. साइंटिस्ट का मानना है कि अगर इस तकनीक को आगे विकसित किया गया तो भविष्य में जरूरत के अनुसार डिजाइन किए गए सूक्ष्म जीवित सिस्टम या 'लिविंग मशीन' तैयार किए जा सकेंगे, जिनका इस्तेमाल चिकित्सा, पर्यावरण संरक्षण और बायोटेक्नोलॉजी  जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है.

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नेचुरल सेल्स से कितना अलग है यह?

स्पडसेल को प्राकृतिक सेल्स की तुलना में काफी सरल बनाया गया है. सामान्य सेल्स विभाजन के लिए साइटोस्केलेटन नामक आंतरिक संरचना का उपयोग करती हैं, लेकिन स्पडसेल में साइंटिस्ट ने अलग रणनीति अपनाई. इसमें कुछ विशेष प्रोटीन कोशिका की झिल्ली पर इकट्ठा होकर इतना दबाव बनाते हैं कि झिल्ली दो हिस्सों में विभाजित हो जाती है. रिसर्चर ने इसमें एक जैनेटिक बदलाव भी किया, जिससे एक खास फ्यूजन प्रोटीन का उत्पादन बढ़ गया. इसका परिणाम यह हुआ कि सेल्स पहले की तुलना में तेजी से बढ़ीं और अधिक नई सेल्स बनाने लगीं.

बायोलॉजिकल रिसर्च के लिए बेहद अहम 

साइंटिस्ट ने बताया कि पांच पीढ़ियों के बाद तेज़ी से बढ़ने वाली सेल्स ने शुरुआती सेल्स की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया. एक और खास बात यह है कि जहां मानव जीनोम का आकार लगभग 30 लाख किलोबेस पेयर का होता है, वहीं स्पडसेल का जीनोम केवल 90 किलोबेस पेयर का है. इसका जैनेटिक पदार्थ एक बड़े क्रोमोसोम की जगह सात अलग-अलग डीएनए प्लास्मिड में बांटा गया है, जिससे साइंटिफिक सेल्स के अलग-अलग कार्यों को स्वतंत्र रूप से नियंत्रित और प्रोग्राम कर सकते हैं. यही विशेषता इस तकनीक को भविष्य के बायोलॉजिकल रिसर्च के लिए बेहद अहम बनाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.