Muharram 2026 Date: इस्लामी नव वर्ष का पहला महीना, जिसे मुहर्रम कहा जाता है. नए चांद (हिलाल) के नजर आने के साथ ही मुहर्रम की शुरुआत होती है. यह दुनियाभर के मुसलमानों के लिए नए चंद्र वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है. इस्लाम धर्म से जुड़े सभी त्योहार चंद्रमा के अनुसार मनाए जानते हैं. इसलिए नया चांद नजर आने के बाद ही सटीक तिथि का पता चलता है.

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मुहर्रम की शुरुआत अमावस्या के बाद पहला नया अर्धचंद्र दिखाई देने के बाद मनाया जाता है. हालांकि मुहर्रम की तिथि स्थान, मौसम और चंद्रमा को देखने की विधि के आधार पर अलग भी हो सकती है. यही कारण है कि आमतौर पर अलग-अलग देशों में मुहर्रम की तिथि अलग होती है. सऊदी में एक दिन पहले तो एशियाई देशों में एक दिन बार इस्लामिक त्योहार मनाए जाते हैं. आइए जानते हैं इस वर्ष मुसलमान कब मनाएंगे मुहर्रम.

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इस्लामिक नए साल की कैलेंडर की शुरुआत को निर्धारित करने के लिए कई मुसलमान अलग-अलग मापदंड अपनाते हैं- जैसे उत्तरी अमेरिका की फ़िक़्ह परिषद ( FCNA ), जो तिथि की गणना के लिए कुछ नियम अपनानी है जैसे- मक्का में सूर्यास्त से पहले चंद्रमा का जन्म (नया होना) होना और सूर्यास्त के बाद चंद्रमा का अस्त होना चाहिए.

मुहर्रम कब है (Muharram 2026 Kab Hai)

मुहर्रम इस्लामिक चंद्र कैलेंडर का पहला महीना होता है, जिसे चार पवित्र महीनों में एक माना जाता है. मुहर्रम की 10वीं तिथि पर आशूरा का विशेष महत्व होता है. इस साल मुहूर्रम की शुरुआत 16 या 17 जून 2026 के आसपास शुरू होने की संभावना है. हालांकि अंतिम तिथि चांद नजर आने के बाद ही पता चलेगी. अगर 16 जून को चांद नजर आता है तो 25 जून को यौम-ए-आशूरा का दिन 25 जून को रहेगा. वहीं किसी कारण 16 जून को चांद नजर नहीं आता तो 26 जून को आशूरा पड़ सकता है.

यौम-ए-आशूरा क्या है

‘आशूरा’ का मतलब होता है ‘दस’ या ‘दसवां’. मुहर्रम की 10वीं तारीख को यौम-ए-आशूरा मनाया जाता है. इस दिन मुस्लिम समुदाय खासकर शिया मुसलमान, हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं और शोक मनाते हैं. इस्लामिक मान्यता अनुसार, पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष किया था. मुहर्रम की 10वीं तारीख को उन्हें उनके परिवार और साथियों सहित शहीद कर दिया गया था. इस्लाम मे इमाम हुसैन की कुर्बानी सत्य, न्याय और मानवता के लिए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक माना जाता है.

इस दिन इमाम हुसैन की शहादत और कर्बला की घटना को याद करते हुए कई स्थानों पर ताजिया जुलूस निकाले जाते हैं, मजलिसों का आयोजन होता है. मुसलामन श्रद्धा, परंपरा और सम्मान के साथ ही इस त्योहार को मनाते हैं.

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