Mahabharat: महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि यह धर्म, तप, त्याग और दान का महासागर भी है. भीष्म पितामह ने शरशय्या पर लेटे हुए युधिष्ठिर को जीवन के अनेक गूढ़ रहस्य बताए थे. उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण विषय था विभिन्न प्रकार के तप और दान का फल.

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युधिष्ठिर युद्ध के बाद अत्यंत दुखी थे. उन्हें अपने ही संबंधियों की मृत्यु का गहरा पश्चाताप था. तब उन्होंने भीष्म पितामह से पूछा कि मनुष्य किस प्रकार अपने पापों से मुक्ति पा सकता है और कौन-से तप तथा दान उसे श्रेष्ठ फल प्रदान करते हैं. तब भीष्म ने तपस्या और दान की महिमा का विस्तार से वर्णन किया.

तपस्या से कैसे बदलता है मनुष्य का भाग्य?

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भीष्म पितामह ने कहा कि तपस्या मनुष्य को स्वर्ग, यश, लंबी आयु और उत्तम सुख प्रदान करती है. तप करने से ज्ञान, विज्ञान, स्वास्थ्य, सुंदरता, संपत्ति और सौभाग्य प्राप्त होता है. तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों को संयमित करना भी है.

भीष्म पितामह ने 18 प्रकार के तप और उनके फल बताए है:

1. कठोर तपस्या

जो मनुष्य कठिन तप करता है, उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है. उसका जीवन यश और सम्मान से भर जाता है.

2. मौन-व्रत

मौन का पालन करने वाला व्यक्ति दूसरों पर प्रभाव स्थापित करता है. उसके भीतर आत्मबल और मानसिक शक्ति बढ़ती है.

3. ब्रह्मचर्य का पालन

ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले मनुष्य को दीर्घायु प्राप्त होती है. उसका मन स्थिर और तेजस्वी बनता है.

4. अहिंसा

भीष्म ने बताया कि अहिंसा का फल सुंदर रूप और श्रेष्ठ जीवन होता है. जो व्यक्ति किसी को कष्ट नहीं देता, वह समाज में सम्मान पाता है.

5. फल-मूल खाकर तप करना

जो व्यक्ति केवल फल और मूल खाकर जीवन व्यतीत करता है, उसे राज्य सुख प्राप्त होता है.

6. पत्तों पर जीवन यापन

पत्तों को भोजन बनाकर तप करने वाला मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त करता है.

7. दूध पीकर रहने का नियम

केवल दूध का सेवन करने वाला साधक स्वर्ग को प्राप्त करता है और उसके जीवन में पवित्रता बढ़ती है.

8. साग खाकर रहने का नियम

जो व्यक्ति केवल साग खाकर तप करता है, वह गो-धन से संपन्न होता है.

9. तृण खाकर जीवन बिताना

घास या तृण पर जीवन बिताने वाले व्यक्ति को स्वर्गलोक प्राप्त होता है.

10. तीनों समय स्नान करना

जो मनुष्य प्रतिदिन तीन बार स्नान करता है, उसे उत्तम स्त्रियों और सुखों की प्राप्ति होती है.

11. वायु सेवन द्वारा तप

हवा पर जीवन व्यतीत करने वाले तपस्वी को यज्ञों के समान फल प्राप्त होता है.

12. नित्य स्नान और संध्योपासना

जो ब्राह्मण प्रतिदिन स्नान कर दोनों समय संध्या और गायत्री मंत्र का जप करता है, वह अत्यंत बुद्धिमान बनता है.

13. जल में रहकर तप करना

जो साधक जल में रहकर तपस्या करता है, उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है.

14. वल्कल वस्त्र धारण करना

पेड़ की छाल के वस्त्र पहनने वाला मनुष्य उत्तम वस्त्र और आभूषण प्राप्त करता है.

15. भूमि पर सोना

मिट्टी या भूमि पर सोने वाला व्यक्ति उत्तम घर और शय्या प्राप्त करता है.

16. अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्यागना

जो योगयुक्त तपस्वी नियमपूर्वक अग्नि में प्रवेश कर शरीर त्यागता है, उसे ब्रह्मलोक में सम्मान मिलता है.

17. रसों का त्याग

जो मनुष्य स्वाद और भोगों का त्याग करता है, उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

18. मांस का त्याग

मांस का त्याग करने वाला व्यक्ति दीर्घायु और उत्तम संतान प्राप्त करता है.

दान और पुण्य का गहरा संबंध क्या है?

भीष्म पितामह ने दान को धर्म का आधार बताया. उन्होंने कहा कि दान देने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और उसे धन, सुख तथा पुण्य की प्राप्ति होती है.

निस्वार्थ दान से मिलते हैं ये अद्भुत फल:

  • दान देने वाला व्यक्ति अधिक धनवान बनता है.
  • गुरु की सेवा करने से विद्या प्राप्त होती है.
  • नित्य श्राद्ध करने से श्रेष्ठ संतान मिलती है.
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन देने से मनुष्य के जीवन में सुख और समृद्धि आती है.

भीष्म पितामह के अनुसार मनुष्य यदि संयम, दया, त्याग और सेवा का मार्ग अपनाए, तो वह इस जीवन में सुख और मृत्यु के बाद उत्तम लोक प्राप्त कर सकता है. तप मन को पवित्र करता है और दान हृदय को विशाल बनाता है. सनातन धर्म में तप और दान को सबसे बड़ा पुण्य कर्म माना गया है.

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