Kedarnath Dham: उत्तराखंड के चारधाम में से एक केदारनाथ में लैंडस्लाइड हो गया है. सड़क बंद होने के कारण कई श्रद्धालु बीच रास्ते में फंस गए हैं. 10 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला भी गया है. यह घटना मुनकटिया क्षेत्र में हुई, जो केदारनाथ यात्रा का एक अहम हिस्सा है. 

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केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर खुले थे जिसके बाद अब तक करीब साढ़े पांच लाख तीर्थयात्री यहां दर्शन कर चुके हैं. इस वर्ष सबसे अधिक आकर्षण और भीड़ केदारनाथ में देखी जा रही है. क्या है केदारनाथ धाम की महीमा, महाभारत काल से क्या है इसका संबंध, आइए जानते हैं. 

क्यों खास है केदारनाथ का स्वयंभू शिवलिंग?

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केदारनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है, यहां ज्योतिर्लिंग स्वयं प्रकट हुआ है. यही वजह है कि इस धाम की महिमा अन्य शिव मंदिरों से अलग मानी जाती है.

मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडव वंश के राजा जनमेजय ने करवाया था. आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार कराया. समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित यह धाम आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है.

केदारनाथ नाम का क्या है अर्थ?

‘केदार’ शब्द का अर्थ पर्वत या ऊंचा स्थल माना जाता है, जबकि ‘नाथ’ का अर्थ स्वामी होता है. इस तरह केदारनाथ का अर्थ हुआ - पर्वतों के स्वामी. हिमालय की गोद में विराजमान भगवान शिव का यह धाम प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम माना जाता है.

नर-नारायण की तपस्या से प्रकट हुए बाबा केदार

हिमालय की बर्फीली वादियों में स्थित केदारनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि तप, त्याग और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण बदरीवन में कठोर तपस्या कर रहे थे. वो हर दिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना करते थे. उनकी अटूट भक्ति और तप से प्रसन्न होकर स्वयं महादेव वहां प्रकट हुए.

जब शिवजी ने वरदान मांगने को कहा, तब नर-नारायण ने उनसे विनती की कि भगवान शिव सदैव इसी स्थान पर निवास करें, ताकि आने वाले युगों तक भक्तों को उनके दर्शन का सौभाग्य मिलता रहे. भक्तों की इस निस्वार्थ भावना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यहां ज्योतिर्लिंग रूप में वास करने का वरदान दिया. तभी से यह पवित्र स्थान ‘केदार क्षेत्र’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

पांडवों की खोज और शिव का बैल रूप

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव अपने ही कुल के विनाश से दुखी थे. वे इस पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव का आशीर्वाद चाहते थे. सबसे पहले वे काशी पहुंचे, लेकिन भगवान शिव उनसे नाराज थे और दर्शन नहीं देना चाहते थे.

कहा जाता है कि शिवजी वहां से अंतर्ध्यान होकर हिमालय के केदार क्षेत्र में आ गए. पांडव भी उनकी खोज में कठिन पहाड़ी रास्तों को पार करते हुए केदार पहुंच गए औप भगवान शिव ने बैल का रूप धारण कर लिया और पशुओं के बीच जाकर छिप गए.

भीम ने ऐसे पहचाना शिव का रूप

पांडवों को शक हो गया कि साधारण बैलों के बीच कोई दिव्य शक्ति मौजूद है. तब भीम ने विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों के बीच अपने पैर फैला दिए. सभी पशु निकल गए, लेकिन एक बैल वहीं रुक गया.

भीम ने जैसे ही उस बैल को पकड़ने की कोशिश की, वह भूमि में समाने लगा. तभी भीम ने उसकी पीठ का हिस्सा पकड़ लिया. उसी क्षण भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और पांडवों की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पापों से मुक्त कर दिया. मान्यता है कि उसी समय से केदारनाथ में बैल की पीठ के आकार के रूप में भगवान शिव की पूजा होती है.

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