Husband Wife Relation: पत्नी-पत्नी का रिश्ता एक गाड़ी के दो पहिए की तरह होता है. अगर एक पहिया काम करना बंद कर दे तो दूसरे पहिए के होते हुए भी गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती है. इसलिए धर्म शास्त्रों में पति-पत्नी को एक दूसरे का पूरक बताया गया है.

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पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ एक साथ रहने या पारिवारिक जिम्मेदारियां को पूरा करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि धर्म और शास्त्रों में इस रिश्ते को एक सबसे पवित्र रिश्ता बताया गया है. लेकिन 90% लोग प्रेम को केवल आकर्षण या भावनात्मक जुड़ाव समझते हैं, जबकि सनातन परंपरा में पति-पत्नी के प्रेम का अर्थ कहीं अधिक गहरा और स्थायी है.

प्रेम की असली परिभाषा क्या है?

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  • बिना शर्त स्वीकार करना
  • कठिन समय में साथ निभाना
  • अहंकार छोड़कर रिश्ते को प्राथमिकता देना
  • एक-दूसरे की आत्मा को समझना

लेकिन इस बीच अहम सवाल यह है कि, पति-पत्नी का प्रेम आखिर कैसा होना चाहिए? पति-पत्नी के रिश्ते और प्रेम का मूल मंत्र शास्त्र और वेदों में कुछ इस प्रकार से बताया गया है-

जनित्रीव प्रति हर्यासि सूनुं सं त्वा दधामि पृथिवीं पृथिव्या । उखा कुम्भी वेद्यां मा व्यथिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषक्ता॥ अथर्ववेद 12.3.23

अर्थ है- हे स्त्री-पुरुषो! माता जैसे पुत्र को प्रेम करती है, वैसे ही तुम लोग आपस में प्रेम करो. मैं तुम्हें पृथ्वी के समान विशाल और दृढ़ (सं दधामि) करता हूं. जैसे यज्ञ वेदी पर रखी हंडी (उखा) दृढ़ता से जमी रहती है, वैसे ही तुम कठिनाइयों में अपने धर्म/कर्तव्य पर अटल रहो.

यह मंत्र गृहस्थ जीवन के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है, जहां प्रेम केवल आकर्षण तक सीमित न रहकर 'वात्सल्य' (पवित्र ममता) जैसा गहरा और अटल हो. साथ ही यह संदेश परिवार में शांति और अटूट बंधन बनाए रखने की कुंजी भी है.

सरल शब्दों में कहें तो, पति-पत्नी के बीच निस्वार्थ (Unconditional)  प्रेम होना चाहिए. ठीक वैसे ही जैसा एक मां अपनी संतान से करती है. पति-पत्नी के बीच प्रेम ऐसा जिसमें बिना कुछ पाने की इच्छा से दोनों केवल एक दूसरे के कल्याण के बारे में सोचे. इसलिए वैवाहिक जीवन में प्रेम की आधारशिला निस्वार्थ भाव होना बेहद जरूरी है.

पति-पत्नी का रिश्ता एक धर्म की तरह

हिंदू धर्म में विवाह को केवल सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि “गृहस्थ आश्राम” कहा गया है. इसमें पति और पत्नी दोनों का यह कर्तव्य है कि, वे एक-दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करें. भगवान शिव और माता पार्वती का वैवाहिक संबंध इस बात का प्रतीक है कि पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक हैं ना कि प्रतिस्पर्धी.

समर्पण ही असली आधार

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, सच्चा प्रेम वह है जिसमें स्वार्थ नहीं होता, बल्कि समर्पण और त्याग होता है. भगवान राम और माता सीता का जीवन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. उनके रिश्ते में विश्वास. सम्मान और धर्म का पालन सबसे ऊपर था.

सम्मान और विश्वास जरूरी

धार्मिक मान्यता अनुसार, जहां सम्मान और विश्वास होता है, प्रेम भी वहीं बसता है. इसलिए केवल भावनाएं नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भावनाओं को समझना और उनका आदर करना भी सच्चे प्रेम का उदाहरण है.

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