Durga Puja 2026: बंगाल की दुर्गा पूजा में बेल के पेड़ की खास भूमिका है. इसी से जुड़ी हैं बिल्व निमंत्रण और बोधन की रस्में. इस बार कोलकाता के पूजा कैलेंडर में दोनों की तारीख भी अलग है.

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नवरात्रि चल रही है, फिर बंगाल की दुर्गा पूजा शुरू होने की बात अब क्यों हो रही है? इसकी वजह वहां की पूजा का अलग क्रम है. कल यानी शुक्रवार 16 अक्टूबर 2026 को बिल्व निमंत्रण है. कोलकाता के लिए पंचांग के कैलेंडर में अकाल बोधन, कल्पारंभ और आमंत्रण-अधिवास 17 अक्टूबर को दिए गए हैं. इसलिए दोनों रस्मों को एक मानकर एक ही तारीख बताना सही नहीं होगा.

बिल्व निमंत्रण का संबंध बेल के पेड़ के माध्यम से देवी को पूजा का निमंत्रण देने से है. बोधन में देवी को जागृत करने की प्रार्थना की जाती है. दोनों एक ही पूजा परंपरा के हिस्से हैं, लेकिन उनका उद्देश्य अलग है.

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बिल्व निमंत्रण में बेल के पेड़ को न्योता क्यों?

बिल्व यानी बेल. दुर्गा पूजा की इस परंपरा में बेल का वृक्ष देवी की उपासना का माध्यम बनता है. बिल्व निमंत्रण इसी वृक्ष से जुड़ी निमंत्रण की रस्म है. इसे केवल बेलपत्र चढ़ाने की पूजा समझना अधूरी जानकारी होगी.

पंचांग के अनुसार, बिल्व निमंत्रण के लिए षष्ठी तिथि का सायंकाल में होना देखा जाता है. इसीलिए इसकी तारीख तय करते समय सिर्फ कैलेंडर में लिखी षष्ठी देख लेना काफी नहीं है.

अकाल बोधन में मां दुर्गा को क्यों जगाते हैं?

बोधन का अर्थ है जगाना. बेलूर मठ के अनुसार इसमें बेल के वृक्ष के पास जल से भरा तांबे का पात्र स्थापित कर देवी से जागृत होने की प्रार्थना की जाती है. मठ में बेल की शाखा को पात्र में रखने की परंपरा भी बताई गई है.

यहां अकाल का मतलब सूखा या संकट नहीं है. इसका आशय प्रचलित समय से अलग समय पर देवी को जगाने से है. धार्मिक मान्यता में दक्षिणायन देवताओं के विश्राम का समय माना गया है. शरद ऋतु की पूजा में देवी को जागृत करने की प्रार्थना इसी विश्वास से जुड़ी है.

भगवान राम से कैसे जुड़ा है अकाल बोधन?

बंगाल की प्रचलित कथा के अनुसार, रावण से युद्ध से पहले भगवान राम ने मां दुर्गा की आराधना की थी. देवी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें जागृत किया गया. दोनों रस्मों का फर्क एक नजर में-

  1. बिल्व निमंत्रण- बेल वृक्ष के माध्यम से पूजा का निमंत्रण
  2. अकाल बोधन- देवी को जागृत करने की प्रार्थना

बोधन के बाद अधिवास और आमंत्रण की रस्में भी होती हैं. बेलूर मठ के अनुसार, आमंत्रण में देवी से अगले दिन की सप्तमी पूजा स्वीकार करने की प्रार्थना की जाती है. इसी वजह से बिल्व निमंत्रण और बोधन के बाद होने वाले आमंत्रण को भी एक ही रस्म मान लेना भ्रम पैदा करता है.

इस बार कब क्या है? कोलकाता के पंचांग कैलेंडर में 16 अक्टूबर को बिल्व निमंत्रण, 17 अक्टूबर को अकाल बोधन और 18 अक्टूबर को सप्तमी व कोलाबौ पूजा दर्ज हैं. किसी पंडाल में रस्म देखने जाना हो तो उसकी निर्धारित पूजा-सूची जरूर देखें.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.