Bhanu Saptami Vrat Katha: भानु सप्तमी का पावन पर्व रविवार और सप्तमी तिथि के संयोग में मनाया जाता है. इस बार यह तिथि 7 जून 2026 को पड़ी है. भगवान सूर्य समस्त चराचर जगत को प्रकाश और ऊर्जा देने वाले देवता हैं. इनकी पूजा से आरोग्य, ऊर्जा, सफलता का आशीर्वाद मिलता है.

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भानु सप्तमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देने का विधान है. साथ बी आज के लिए जो लोग विधि-विधान से सूर्य देव की पूजा करते हैं और इस व्रत कथा का पाठ करते हैं या कथा सुनते हैं, उन्हें पूजा का संपूर्ण लाभ मिलता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

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भानु सप्तमी व्रत कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में इंदुमती नाम की एक गणिका (वेश्या) रहती थी. अपने जीवन में वह सांसारिक भोग-विलास में लिप्त रही और उसने कभी विशेष रूप से धर्म-कर्म या पुण्य कार्य नहीं किए. समय बीतने के साथ उसके मन में यह इच्छा जागृत हुई कि मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति हो. इस उद्देश्य से वह महर्षि वशिष्ठ के पास पहुंची और उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा कि क्या उसके जैसे पापों में लिप्त व्यक्ति के लिए भी मुक्ति का कोई मार्ग है.

इंदुमती की जिज्ञासा सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने उसे भानु सप्तमी, जिसे अचला सप्तमी भी कहा जाता है का महत्व बताया. उन्होंने कहा कि यह व्रत स्त्रियों को सुख, सौभाग्य, सुंदरता और अंततः मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है. जो श्रद्धा और नियमपूर्वक इस दिन सूर्य देव की पूजा करता है, उसे अपनी इच्छानुसार शुभ फल प्राप्त होते हैं.

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महर्षि वशिष्ठ ने इंदुमती से कहा कि यदि वह इस जन्म के बाद जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होना चाहती है, तो उसे पूरे विश्वास और भक्ति के साथ भानु सप्तमी का व्रत और सूर्य उपासना करनी चाहिए. ऋषि के उपदेश को सुनकर इंदुमती ने पूरी निष्ठा के साथ इस व्रत का पालन किया. कहा जाता है कि इस पुण्य के प्रभाव से मृत्यु के पश्चात उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई और स्वर्गलोक में उसे अप्सराओं की प्रमुख के रूप में सम्मान मिला.

इसी पौराणिक कथा के आधार पर आज भी श्रद्धालु भानु सप्तमी का व्रत रखते हैं और सूर्य देव की आराधना करके सुख, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं. ऐसी मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किया गया यह व्रत व्यक्ति के जीवन में शुभ फल और पुण्य प्रदान करता है.

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