How Situationship Affects Mental Health: आज की डेटिंग दुनिया में रिश्तों का एक नया रूप तेजी से सामने आया है सिचुएशनशिप. यह ऐसे रिश्ते होते हैं जो दिखने में प्यार जैसे लगते हैं, लेकिन उनमें कोई साफ कमिटमेंट नहीं होता. शुरुआत में ये कनेक्शन अच्छे लग सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे ये मानसिक रूप से थका देने वाले बन जाते हैं. काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट दिव्या मोहिंदरू के अनुसार, ऐसे रिश्ते लोगों को कन्फ्यूजन, असुरक्षा और इमोशनल स्ट्रेस में डाल देते हैं.

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सिचुएशनशिप और कमिटेड रिलेशनशिप के बीच अंतर

सिचुएशनशिप और एक कमिटेड रिलेशनशिप के बीच सबसे बड़ा फर्क क्लैरिटी का होता है. ऐसे रिश्तों में अक्सर कोई लेबल नहीं होता कि "हम बस बात कर रहे हैं" जैसे जवाब मिलते हैं. कभी बहुत करीब, तो कभी अचानक दूरी यानी मिक्स्ड सिग्नल्स. न कोई भविष्य की योजना, न बराबर की कोशिश. कई बार फिजिकल नजदीकी ज्यादा होती है, लेकिन इमोशनल कनेक्शन कमजोर रहता है. वहीं एक पक्के रिश्ते में स्पष्टता, भरोसा, संतुलन और भविष्य की दिशा होती है.

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कई बार सामने वाला सीधे कमिटमेंट से बचता है, लेकिन बातों में आपको जोड़े रखता है। जैसे कि "देखते हैं आगे क्या होता है", "इस वीकेंड मिलते हैं कभी" या "मिस यू…" जैसे मैसेज, जो आपको उम्मीद में बांधे रखते हैं, लेकिन कुछ तय नहीं करते. 

अपने रिश्तों का कैसे पता करें?

अगर आपको खुद समझ नहीं आ रहा कि आप इस तरह के रिश्ते में हैं या नहीं, तो कुछ सवाल खुद से पूछें कि क्या आपको नहीं पता कि आप दोनों एक्सक्लूसिव हैं या नहीं? क्या प्लान हमेशा आखिरी वक्त पर बनते हैं? क्या महीनों बाद भी आपने उनके दोस्तों से मुलाकात नहीं की? क्या वो आपको "बेब" कहते हैं, लेकिन कभी "गर्लफ्रेंड" नहीं? अगर इन सवालों का जवाब हां है, तो आप शायद एक सिचुएशनशिप में हैं.

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जंक फूड की तरह असर

ऐसे रिश्तों का असर धीरे-धीरे दिखता है। यह किसी जंक फूड जैसा होता है, पहले अच्छा लगता है, लेकिन संतुष्टि नहीं देता. आप लगभग वाली स्थिति में फंसे रहते हैं कि लगभग प्यार, लगभग कमिटमेंट. बार-बार बदलते संकेत आपको और उलझाते हैं, जिससे आत्मविश्वास भी प्रभावित होने लगता है. 

इन रिश्तों में आमतौर पर एक व्यक्ति ज्यादा जुड़ जाता है, जबकि दूसरा दूरी बनाए रखता है. जो कमिटमेंट चाहता है, वह उम्मीद में रहता है कि चीजें आगे बढ़ेंगी, जबकि दूसरा व्यक्ति अपनी जरूरतें पूरी करता रहता है, बिना पूरी तरह जुड़ने के. यही असंतुलन तनाव और असुरक्षा बढ़ाता है. ऐसे में सीमाएं तय करना जरूरी हो जाता है. अपने रिश्ते को लेकर साफ बात करना, बिना कमिटमेंट के आगे न बढ़ना और अपनी प्राथमिकताओं को समझना जरूरी है. अगर सामने वाला स्पष्टता नहीं देता, तो यह भी एक जवाब ही होता है.

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