Old Antibiotics : आज दुनिया भर में वैज्ञानिक एक बहुत बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं. यह समस्या एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (AMR) है. इसका मतलब है कि बैक्टीरिया धीरे-धीरे उन दवाओं के खिलाफ खुद को मजबूत बना रहे हैं, जिनसे हम उन्हें मार सकते थे. इसका असर इतना खतरनाक हो गया है कि हल्की-सी संक्रमण भी मुश्किल से ठीक होती है और कई बार जानलेवा साबित हो सकती है.

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भारत में इसका असर साफ दिखता है. 2021 में लगभग 2.6 लाख लोग सिर्फ इसलिए मरे क्योंकि उनके शरीर में संक्रमण उस एंटीबायोटिक दवा से नहीं रुके. इसका मतलब यह है कि अगर दवाएं काम कर रही होतीं, तो ये मौतें रोकी जा सकती थीं, लेकिन अब आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) के शोधकर्ताओं ने एक नया तरीका निकाला है. उन्होंने नए एंटीबायोटिक बनाने की जगह पुरानी दवाओं को फिर से असरदार बनाने का रास्ता निकाला है. ऐसे में आइए जानते हैं कि पुरानी एंटीबायोटिक्स दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं और इसका तरीका क्या है.

एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया कैसे नहीं मार पाती हैं?

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मैक्रोलाइड्स (Macrolides) एंटीबायोटिक की एक आम कैटेगरी है, जिसमें एजिथ्रोमाइसिन (Azithromycin) और एरिथ्रोमाइसिन (Erythromycin) जैसी दवाएं आती हैं. ये दवाएं बैक्टीरिया की प्रोटीन बनाने की मशीन यानी राइबोसोम (ribosome) पर हमला करती हैं. राइबोसोम को रोककर, बैक्टीरिया जरूरी प्रोटीन नहीं बना पाता और मर जाता है, लेकिन बैक्टीरिया भी पीछे नहीं रहते है. वे Erm एंजाइम्स का इस्तेमाल करके राइबोसोम को बदल देते हैं. इस वजह से एंटीबायोटिक दवा बैक्टीरिया को मार नहीं पाती हैं. 

पुरानी एंटीबायोटिक्स दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं?

आईआईटी बॉम्बे की टीम ने Erm एंजाइम को इनएक्टिव करने का तरीका निकाला है. उन्होंने एप्टामर्स (Aptamers) का इस्तेमाल किया. एप्टामर्स छोटे, सिंथेटिक DNA के टुकड़े होते हैं. ये DNA टुकड़े विशेष रूप से Erm 42 एंजाइम से जुड़ते हैं.  शोधकर्ताओं ने लाखों DNA सिक्वेंस में से दो सबसे प्रभावी एप्टामर्स चुने. एप्टामर्स को और ज्यादा सटीक बनाने के लिए, बेकार हिस्सों को हटा दिया गया. इसका मतलब है कि अब यह सीधे Erm एंजाइम को निशाना बनाता है और उसे काम करने से रोक देता है. 

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इसका तरीका क्या है?

DNA एप्टामर्स अकेले बैक्टीरिया में नहीं जा सकते. ये आसानी से टूट जाते हैं और बैक्टीरिया की झिल्ली पार नहीं कर पाते. टीम ने इसका हल लिपोसोम (Liposomes) निकाला है.  यह छोटे, गोल,  फैट से बने बबल्स होते हैं. ये बैक्टीरिया की झिल्ली से आसानी से घुल-मिल जाते हैं. इन लिपोसोम्स में DNA एप्टामर्स को पैक किया गया ताकि वे सुरक्षित तरीके से बैक्टीरिया के अंदर पहुंच सकें. 

कितना असरदार है नया शोध?

शोधकर्ताओं ने Staphylococcus aureus, एक मुश्किल बैक्टीरिया पर इस तकनीक का परीक्षण किया. जब एप्टामर्स को लिपोसोम के साथ भेजा गया, तो 90 प्रतिशत से ज्यादा बैक्टीरिया ने इन्हें स्वीकार किया. एप्टामर्स और एंटीबायोटिक को मिलाकर देने से बैक्टीरिया की मृत्यु बढ़ गई, जबकि एंटीबायोटिक अकेले बहुत कम असर करता है. ऐसे में Erm एंजाइम इनएक्टिव हो गया और दवा फिर से राइबोसोम पर काम कर सकी. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.